Friday, October 13, 2017

मोदी राज! अखबार चैनल समर्पण करें या फिर मर जाएं: क्या सभी मर जाएंगे?



 करणीदानसिंह राजपूत-
आजादी प्राप्त करने के लिए देश में समाचार पत्रों के माध्यम से अंग्रेज सरकार से दिन रात युद्ध कर आजादी दिलाने वाले अमर पत्रकारों लेखकों को नमन करते हुए आज की व्यवस्थापक लिखते हुए बड़ी पीड़ा दुख और दर्द दिल और दिमाग में झनझन कर  रहा है।

 कांग्रेस का शासन इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री काल और सन 1975 में आपातकाल लगा कर मौलिक अधिकारों का हनन किया गया जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई थी।
 उस समय प्रमुख रुप से प्रिंट मीडिया ही था जिसका गला घोटने में कोई कदम सरकार ने बाकी नहीं छोड़ा था।
 अखबारों पर सेंसर लगाया गया। विज्ञापन बंद किए गए। संपादकों पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया लेकिन उस काल में भयानक संकट के बाद भी पत्रकार और अखबार जीवित रह गए थे।
 सन 2014 में राष्ट्रवादी देश भक्त कहलाने वाले भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काल शुरू हुआ। 
यह काल अपने विरुद्ध मामूली सी आलोचना भी सहन करना नहीं चाहता। देश में अखबारों की स्थापना और विस्तार जो अनेक सालों की दिन रात मेहनत से स्थापित हुआ उसे खत्म करने के प्रयास शुरू हुए और आज देश के हजारों समाचार पत्र पत्रिकाएं बंद हो चुक हैं। हजारों पत्र पत्रिकाएं बंद होने की स्थिति में है। समाचार पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित करने का कार्य हमेशा संघर्षपूर्ण ही रहा और मोदी के प्रधानमंत्री काल में  तो इतने संकट पैदा कर दिए गए हैं  कि पत्र-पत्रिकाओं के मालिक प्रकाशक आज कर्जे में डूबे हुए अंतिम सांसे ले रहे हैं।
मोदी के काल में जो सत्ताधारी नेता हैं वह सच सुनना नहीं चाहते। सच पढ़ना नहीं चाहते। सरकार के लादे गए नियम कानून कि कोई आलोचना और समालोचना नहीं करें। केवल गूंगे बहरे बनकर उनका पालन करते जाएं अगर कोई उनमें कमी पाए तो चुपचाप सहन करें। 
समाचार पत्र और पत्रिकाओं को ऐसी स्थिति में लाया जा रहा है कि वह सत्ता के आगे सरेंडर करें झुक जाएं। सत्ता के कहने के अनुरूप पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित करें। आपने तांगे के आगे जुते हुए घोड़े को देखा होगा। उसका ऐनक लगा होता है जो चमड़े का होता है उसमें से कुछ भी दिखाई नहीं देता। घोड़े को लगाम से संचालित किया जाता है।
 बस मोदी सरकार यही चाहती है कि अखबारों के पत्रिकाओं के मालिक सरकार का चश्मा धारण कर ले और सरकार की लगाम के अनुरूप अपने आप को चलाएं। सरकार चाहती है कि सरेंडर करें या फिर अपने आप को खत्म कर दें। मोदी सरकार के आने के बाद आरएनआई डीएवीपी संस्थान ने अनेक नियम लागू किए हैं जिनका उद्देश्य स्पष्ट रुप से दबाव डालता है की सरकार के आगे मीडिया सरेंडर कर दे चाहे वह  प्रिंट मीडिया हो चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक चैनल वाला मीडिया हो। सरकार ने ऐसी विज्ञापन नीति बनाई है।
जनता यह सब देख रही है । आज अनेक समाचार पत्र और पत्रिकाएं सरकार के अनुरूप चलने लगे हैं लेकिनअनेक चैनल और अनेक बड़े और छोटे अखबार जिनमें इलाके से निकलने वाले साप्ताहिक और पाक्षिक अखबार हैं वह सरेंडर करने को तैयार नहीं है। निश्चित रूप से इन अखबारों के संघर्षशील मालिक प्रकाशक संपादक और उनमें काम करने वाले पत्रकार साथी नमन करने के योग्य हैं।
आज देश की राजधानी दिल्ली ही नहीं हमारे आसपास छोटे छोटे कस्बों से निकलने वाले पत्र पत्रिकाएं भी मोदी काल के संकट को झेलते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के झंडे को थामे हुए आम जनता  की आवाज बने हुए हैं। 
जनता व  सामाजिक संगठनों को ऐसे पत्र और पत्रकारों को सहयोग प्रदान करना चाहिए।  अभी हम सहयोग प्रदान करने में बहुत पीछे हैं। अगर सहयोग प्रदान करने में देरी हुई तो अनेक पत्र-पत्रिकाएं संघर्ष करते हुए खत्म हो जाएंगे। पत्र-पत्रिकाओं का खत्म होना देश के स्वतंत्र जन जीवन के लिए बहुत बुरा होगा। 

 मैं इतना लिखने के साथ ही यहां पर 'नया इंडिया' अखबार में 13 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित  संपादकीय को दे रहा हूं जिसका एक एक शब्द आज के बुरे हालात को बयान कर रहा है।

नया इंडिया में 13 अक्टूबर 2017 को संपादक ने लिखा मोदी नीति का कड़वा सच!

पाठक माई बाप माफ करें
इसलिए कि मुझे नया इंडिया को हल्का, बेरंग बनाना पड़ा है। आपकी शिकायत सही है कि मेरा न तीन में और न पांच में वाला अखबार है बावजूद आप पक्के पाठक हैं! अखबार ढूंढ़ कर पढ़ते हैं तो इतना तो हो कि अखबार वाली फीलिंग जैसा आकार प्रकार बनाए रहें। पेज घटाएं, बरदाश्त है मगर पूरा काला सफेद तो न बनाएं!

आपकी शिकायत सचमुच सिर आंखों पर। मगर करूं क्या? न मेरे बस में कुछ है और न अपने पास कोई भामशाह है। वैसे किसी के भी बस में कुछ नहीं है। यहां तक की नरेंद्र मोदी, अमित शाह के बस में भी कुछ नहीं है। ये दोनों अपनी आदत, अहंकार और उन मूर्खताओं के मारे हैं जो इन्हें दिखलाई दे रहा है रंग-बिरंगा इंद्रधनुष मगर हकीकत में है सब काला अंधेरा, बेरंग! ये अपने अंधेरे में, अपने बनवाए अंधेरे में ‘न्यू इंडिया’ का वह दिवास्वप्न देख रहे है, जिसमें न ‘नया इंडिया’ की जरूरत है और न बुद्धि की, न लेखन की, न पत्रकारिता की, न स्वतंत्र सत्यशोधन की जरूरत होनी है!

ढाई लोगों के वामन अवतार ने ढाई कदम में पूरे भारत को माप अपनी ढाई गज की जो दुनिया बना ली है उसमें अंबानी, अडानी, बिड़ला, जैन, अग्रवाल, गुप्ता याकि वे धनपति और बड़े मीडिया मालिक जरूर मतलब रखते हैं, जिनकी दुनिया क्रोनी पूंजीवाद से रंगीन है और जो अपने रंगों की हाकिम के कहे अनुसार उठक बैठक कराते रहते हैं।



आज का अंधेरा हम सवा सौ करोड़ लोगों की बीमारी की असलियत लिए हुए है। ढाई लोगों के वामन अवतार ने लोकतंत्र को जैसे नचाया है, रौंदा है, मीडिया को गुलाम बना उसकी विश्वसनीयता को जैसे बरबाद किया है वह कई मायनों में पूरे समाज, सभी संस्थाओं की बरबादी का प्रतिनिधि भी है।
 तभी तो यह नौबत आई जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को कहना पड़ा कि यह न कहा करें कि फलां जज सरकारपरस्त है और फलां नहीं! अदालत हो, एनजीओ हो, मीडिया हो, कारोबार हो, भाजपा हो, भाजपा का मार्गदर्शक मंडल हो, संघ परिवार हो या विपक्ष सबका अस्तित्व ढाई लोगों के ढाई कदमों वाले ‘न्यू इंडिया’ के तले बंधक है! 
आडवाणी, जोशी जैसे चेहरे रोते हुए तो मीडिया रेंगता हुआ। आडवाणी ने इमरजेंसी में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने झुकने के लिए कहा था मगर आप रेंगने लगे! वहीं आडवाणी आज खुद के, खुद की बनाई पार्टी और संघ परिवार या पूरे देश के रेंगने से भी अधिक बुरी दशा के बावजूद ऊफ तक नहीं निकाल पा रहे हैं।

सोचें, क्या हाल है! हिंदू और गर्व से कहो हम हिंदू हैं (याद है आडवाणी का वह वक्त), उसका राष्ट्रवाद इतना हिजड़ा होगा यह अपन ने सपने में नहीं सोचा था। और यह मेरा निचोड़ है जो 40 साल से हिंदू की बात करता रहा है! मैं हिंदू राष्ट्रवादी रहा हूं। इसमें मैं ‘नया इंडिया’ का वह ख्याल लिए हुए था कि यदि लोकतंत्र ने लिबरल, सेकुलर नेहरूवादी धारा को मौका दिया है तो हिंदू हित की बात, दक्षिणपंथ, मुसलमान को धर्म के दड़बे से बाहर निकाल उन्हें आधुनिक बनवाने की धारा का भी सत्ता में स्थान बनना चाहिए। यह सब सोचते हुए कतई कल्पना नहीं की थी कि इससे नया इंडिया की बजाय मोदी इंडिया बनेगा और कथित हिंदू राष्ट्रवादी सवा सौ करोड़ लोगों की बुद्धि, पेट, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, सामाजिक आर्थिक सुरक्षा को तुगलकी, भस्मासुरी प्रयोगशाला से गुलामी, खौफ के उस दौर में फिर हिंदुओं को पहुंचा देगा, जिससे 14 सौ काल की गुलामी के डीएनए जिंदा हो उठें। आडवाणी भी रोते हुए दिखलाई दें।

आप सोच नहीं सकते हैं कि नरेंद्र मोदी, और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने साढ़े तीन सालों में मीडिया को मारने, खत्म करने के लिए दिन-रात कैसे-कैसे उपाय किए हैं। एक-एक खबर को मॉनिटर करते हैं। मालिकों को बुला कर हड़काते हैं। धमकियां देते हैं। जैसे गली का दादा अपनी दादागिरी, तूती बनवाने के लिए दस तरह की तिकड़में सोचता हैं उसी अंदाज में नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने भारत सरकार की विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी के जरिए हर अखबार को परेशान किया ताकि खत्म हों या समर्पण हो। सैकड़ों टीवी चैनलों, अखबारों की इम्पैनलिंग बंद करवाई। इधर से नहीं तो उधर से और उधर से नहीं तो इधर के दस तरह के प्रपंचों में छोटे-छोटे प्रकाशकों-संपादकों पर यह साबित करने का शिकंजा कसा कि तुम लोग चोर हो। इसलिए तुम लोगों को जीने का अधिकार नहीं और यदि जिंदा रहना है तो बोलो जय हो मोदी! जय हो अमित शाह! जय हो अरूण जेटली! और इस बात पर सिर्फ मीडिया के संदर्भ में ही न विचार करें! लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को, लोगों को कथित ‘न्यू इंडिया’ में ऐसे ही हैंडल किया जा रहा है। ढाई लोगों की सत्ता के चश्मे में आडवाणी हों या हरिशंकर व्यास या सिर्दाथ वरदराजन, भाजपा का कोई मुख्यमंत्री या मोहन भागवत तक सब इसलिए एक जैसे हैं कि सभी ‘न्यू इंडिया’ की प्रयोगशाला में महज पात्र हैं, जिन्हें भेड़, चूहे के अलग-अलग परीक्षणों से ‘न्यू इंडिया’ लायक बनाना है।

सो, ‘न्यू इंडिया’ बन रहा है तो ‘नया इंडिया’ की क्या तुक! यह मेरी पुरानी थीसिस है कि हम हिंदू भक्ति और गुलामी में जीते हुए अपने को दोयम बनाए रखने के लिए शापित हैं। इसी फ्रेमवर्क में गांधी-नेहरू के व्यवहार से ले कर नरेंद्र मोदी तक के व्यवहार को तौलते हुए अपने को जो समझ आया उस पर मैंने हिंदू तासीर में विचार किया। हिंदू के गुलाम डीएनए से अपने को मुक्त बनाए रखने की जद्दोजहद में तभी यह कभी नहीं सोचा कि यदि ऐसा लिखा तो क्या होगा। हिंदू बहुल इस देश में स्वतंत्र हिंदू बन कर रहा जा सकता है या नहीं, यह कसौटी कई कारणों से अपने लिए अहम रही है। इस पर फिर कभी लिखूंगा।

कोर बात यह है कि दक्षिणपंथ और हिंदू हित ने 1978 से ले कर अब तक मैंने अपने को जैसे जो ढाला उसका कोर स्वतंत्रता रही है। विचार आजादी है। उसके साथ यह प्रमाणित करने की कोशिश भी है कि हिंदू कायर नहीं होते। मूर्ख नहीं होते और हिंदू के लिए जरूरी है वह बौद्धिक उर्वरता, जिससे उसके लिए भी कभी पुनर्जागरण का अवसर बने।

भला इन बातों का नरेंद्र मोदी, अरूण जेटली, अमित शाह के वामन अवतार में क्या मोल है? मोदी-शाह ने संघ परिवार के अनुशासन, उसके बौद्धिक विन्यास से समझ रखा है कि ये सब गुलाम डीएनए का सत्व-तत्व लिए हुए हैं। ये जब ऐसे हैं तो सवा सौ करोड़ भी वैसे हैं। इनके लिए हमें अवतारी राजा बन कर ‘न्यू इंडिया‘ बनाना होगा। यों भी हमारे पुराण सत्तावान को भगवान विष्णु का सृष्टिकर्ता अवतार बता गए हैं। सो, नरेंद्र मोदी गंगा के घाट रूद्राक्ष- भगवा धारण कर अपने को शिव अवतार क्यों न समझें! क्यों न बोलें कि वे भगवान शिव की तरह गले में दुनिया भर का विष ग्रहण किए हुए हैं! उन्हें सब पता है। सर्वज्ञ हैं। वे समर्थ हैं श्रीकृष्ण की तरह श्रीमुख में सवा सौ करोड़ लोगों को ब्रह्माण्ड दर्शन करवाने में! वे तो राजा हरिश्चंद्र! वे शूरवीरों के शूरवीर! सोने की चिड़िया के ‘न्यू इंडिया’ वाले निर्माणकर्ता!

जब ऐसा है तो हर दिन जमीन का अहसास कराने, पतन के चेहरे, बौनों के राज, नोटबंदी को मूर्खता की पराकाष्ठा कहने वाला, जीएसटी को विकृत बताने वाला, नवाज शरीफ के साथ पकौड़े खाने या जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ एलायंस के नुकसान बताने वाला ‘नया इंडिया’ भगवानजी के लिए किरकिरी तो बनेगा। तभी नरेंद्र मोदी का 2014 में जब राज आया तब नया इंडिया 16 पेज का दौड़ता हुआ अखबार था। आठ पेज रंगीन। आज स्वरूप आठ पेज और बेरंग होने का भी तो इसलिए कि मैं खुद रंगीन नहीं हूं। काला पेन, काली स्याही से समझ आने वाले सफेद, काले, सच-झूठ में घूमता रहता हूं।

अब यह अपना मन है तो है! मेरे लिए तो यह हिंदू के गुलाम डीएनए की कसौटी में परीक्षा में पास-फेल होना है! विज्ञापन नहीं आए तो बंद कर देंगे अखबार। लिखना तो बंद नहीं होगा। सो, पाठक माई बाप, महत्व इस बात का है कि मैं लिखता रहूं। हम लिखते रहें। मैं, डॉक्टर वैदिक, शंकर शरण, पंकज शर्मा, बलबीर पुंज, अजीत, श्रुति सब लिखते रहें। मोदी से जब उम्मीद थी तो खम ठोंक लिखा था। वे तुगलकी हुए तो उसमें भी खम ठोंक व्याख्या में हिचक नहीं। नोटबंदी पर जब मैंने लिखा था तो असंख्य पाठकों ने उलजुलूल बातें कीं। सोशल मीडिया के मूर्ख हिंदू लंगूरों ने दस तरह की बातें की। तब अपना तर्क था इंतजार करो। वक्त पर छोड़ो बात को। मैं सही या गलत इसका फैसला वक्त को करने दें। और वक्त ने मुझे गलत प्रमाणित किया तो बतौर हिंदू राष्ट्रवादी माफी मांगने की मर्दानगी भी मैं रखता हूं। सही या गलत पर विचारते हुए अपना काम तो कलम घसीटते जाना है। उस धर्म-कर्म को गालियों की चिंता नहीं।

सो, पाठक माई-बाप पेज कम हो या स्याही रंगीन न हो फर्क नहीं पड़ता। जरूरी कलम और काली स्याही है। सोचें, सरस्वती और लक्ष्मी का साथ नहीं होता है मगर कलम और स्याही दोनों की पूजा में अनिवार्यता है!

हम सब आज के परिवेश के मारे हैं। मैं चोर हूं, आप चोर हैं, ढाई लोगों को छोड़ कर सभी सवा सौ करोड़ लोग चोर हैं तो हमें दंड तो भुगतना होगा! याद है न आपको इस देश की सत्ता, सिस्टम से निकली उफ वह बात! संसद में कही वह बात कि यह कैसी सवा सौ करोड़ की आबादी है जो टैक्स नहीं देती! इसलिए उन्होंने ठाना हुआ है कि वे हम चोरों को ठीक कर ‘न्यू इंडिया’ बनाएंगे। जो है उसे बेरंग करेंगें, उसे अंधेरे में डुबोएंगे। उसे ध्वंस करेंगे। इस ध्वंस से फिर मोदीजी का ‘न्यू इंडिया’ बनेगा, जिसे दुनिया देख कहा करेगी कि जो तुगलक नहीं कर पाया उसे इक्कीसवीं सदी के तुगलक ने कर दिखाया!

फिर माफी के साथ आग्रह कि जब हम सब अंधेरे में हैं, काली दिवाली मना रहे हैं, लक्ष्मीजी रूठ गई हैं तब भी न छोड़ें सरस्वती आराधना। रखें भरोसा कलम, स्याही पर। नया इंडिया पर। जरूर नोट करके रखें कि न नया इंडिया गलत होगा और न आप। 
हां, अहंकार का ध्वंस रावण की तरह ही होगा!



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