रविवार, 17 सितंबर 2017

मत करो कलंकित मानवता:कविता- रमेश छाबड़ा



मत करो कलंकित मानवता

नफरत फैलाना ठीक नहीं

हिंदी हो,बात हिन्द की हो

यूँ धौंस दिखाना ठीक नहीं


बात गाय की करो मगर

हाथ में खंजर क्योंकर है?

गौरक्षक बन कर लोगों पर

यूँ हाथ उठाना ठीक नही


ये देश है गौतम गांधी का

ये बात भुलाना ठीक नहीं

धर्मो के चक्कर में पड़

भ्रम फैलाना ठीक नहीं


जाति धर्म का भेद करें

ये भारत की तहजीब नहीं

जो राह टूट को जाती हो

उस राह पे जाना ठीक नहीं


भारत के हैं लाल सभी

क्यों देश धर्म की बात नहीं

क्यों फर्क दिखाई देता है

दिल में क्यों सद्भाव नहीं


आँखों में दिखता प्रेम नहीं

वो भाईचारा कहाँ गया?

ये जहर यहाँ कैसे आया?

क्यों उसकी कोई बात नहीं?


क्यों भीड़ निरंकुश होती है?

खामोश देश क्यों रहता है?

क्या यहाँ कोई सरकार नहीं

या लोगों में जज्बात नहीं ।

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रमेश चंद्र छाबड़ा,

सूरत गढ।


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