सोमवार, 3 जुलाई 2017

मीरा कुमार के मुकाबले कहीं नहीं ठहरते रामनाथ कोविंद

कसौटी पर राष्ट्रपति पद के राजग के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद यूपीए उम्मीदवार मीरा कुमार के मुकाबले कहीं नहीं ठहरते। मीरा कुमार ने पांच बार लोकसभा चुनाव जीता है, जबकि कोविंद सक्रिय राजनीति करते हुए भी मतदाताओं के बीच कभी कोई चुनाव नहीं जीत पाए। लगातार बारह साल राज्यसभा सदस्य रहने के बाद 2007 में वे कानपुर देहात की भोगिनीपुर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ बैठे। इस चुनाव में वे तीसरे नंबर पर आए। रही कोविंद के बहाने दलित कार्ड चलने की दलील तो देश का पहला दलित राष्ट्रपति बनाने का श्रेय कांग्रेस के खाते में दर्ज है। केआर नारायणन को कांग्रेस ने पहले उपराष्ट्रपति बनाया था और फिर राष्ट्रपति।

जहां तक दोनों उम्मीदवारों की योग्यता का सवाल है, मीरा कुमार का पलड़ा बेशक भारी है। इसमें दो राय नहीं कि संख्या बल कोविंद के पक्ष में है और उनकी जीत में विपक्ष को भी संदेह नहीं होगा। बाकी पेज 8 पर पर कोविंद की पहचान तो उनके अपने सूबे यूपी तक में जुझारू दलित नेता के नाते कभी नहीं रही। दलितों के हितों के लिए कभी कोई आंदोलन भी नहीं किया। वे 1991 में कल्याण सिंह की बदौलत भाजपा में आए थे। कल्याण सिंह ने ही कोली जाति के कोविंद को घाटमपुर से लोकसभा चुनाव लड़ाया था। यह दौर राममंदिर की लहर का था। भाजपा ने पहली बार यूपी में 52 लोकसभा सीटें जीती थीं। कल्याण सिंह बहुमत पाकर सूबे के मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन कोविंद ऐसे कमजोर उम्मीदवार निकले कि राम लहर में भी जनता दल के उम्मीदवार से मात खा गए थे।

उधर, मीरा कुमार की बात करें तो एक तो वे देश के कद्दावर दलित नेता रहे बाबू जगजीवन राम की बेटी हैं, दूसरे राजनीति में आने से पहले भारतीय विदेश सेवा की अफसर थीं। राजीव गांधी ने खुद उनसे नौकरी छुड़वा कर उन्हें बिजनौर लोकसभा सीट का उपचुनाव लड़वाया था। पहले ही चुनाव में वे जीत गई थीं। बाद में वे अपने पिता की सासाराम सीट से लड़ीं और चार बार जीतीं। केंद्र में पहले मंत्री रहीं और फिर लोकसभा अध्यक्ष बनीं। इसके उलट कोविंद भाजपा में भी कभी बड़े पदों पर नहीं रहे। एक बार पार्टी के राष्ट्रीय अनुसूचित जाति मोर्चे के अध्यक्ष जरूर बने थे। कुछ दिन प्रवक्ता तो रहे पर पत्रकारों का सामना करने से संकोच ही किया।भाजपा के नेता आज अपने उम्मीदवार की योग्यता और अनुभव का चाहे जितना बखान करें पर वे इस तथ्य को नहीं छिपा सकते कि 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार बनने से कुछ माह पहले तक कोविंद उत्तर प्रदेश भाजपा के महामंत्री भर थे। लोकसभा चुनाव लड़ने के फेर में उन्होंने इस पद से भी इस्तीफा दे दिया था। पार्टी ने तब उन्हें लोकसभा की उम्मीदवारी लायक भी नहीं माना था। अलबत्ता कुछ दिन बाद दलित होने के कारण उनकी किस्मत जागी और उन्हें बिहार का राज्यपाल बना दिया गया। सूत्रों के मुताबिक रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति पद के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली पसंद नहीं थे। ज्यादा चर्चा तो झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मु के नाम की ही थी। इसकी दीगर वजह भी थी। उनके उम्मीदवार बनाए जाने पर भाजपा देश के आदिवासियों को यह संदेश दे सकती थी कि पहला आदिवासी राष्ट्रपति उसने बनाया। चूंकि अनुसूचित जाति का पहला राष्ट्रपति कांग्रेस के खाते में दर्ज है। नारायणन जाति से बेशक दलित थे पर योग्यता के मामले में वे सब पर भारी थे। कोविंद के सहारे भाजपा अनुसूचित जातियों को अपने साथ जोड़ पाने के मिशन में भी शायद ही सफल हो पाए। अनुसूचित जातियों में कोली जाति की तादाद वैसे भी बहुत ज्यादा नहीं है। एक तरह से भाजपा ने जनाधारविहीन दलित पर दांव लगाया है।(जनसत्ता)

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