Monday, July 10, 2017

लालू परिवार पर छापों से नीतीश की सरकार पर मंडराता खतरा

 सीबीआई और इडी द्वारा लालू प्रसाद यादव के परिवार पर मारे गए छापों के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। 


इस संकट के चलते बिहार की राजनीति नीतीश की सरकार गिरने और राष्ट्रपति शासन लागू होने की तरफ बढ़ रही है। हालांकि पूरे संकट से निपटने के लिए नीतीश कुमार ने मंगलवार को पार्टी की बैठक बुलाई है लेकिन उनके लिए इस चक्रव्यू से निकलना इतना आसान नहीं है। 

नीतीश कुमार की छवि एक साफ सुथरे मुख्यमंत्री की है और उनपर वित्तीय गड़बड़ी का आरोप नहीं है। उनकी यही साफ छवि उनकी पूंजी है। यदि नीतीश ने इस पूंजी को कायम रखना है तो उन्हें लालू के बेटों को कैबिनेट से हटाना होगा। पार्टी के भीतर और बाहर से उनपर ये भारी दबाव है। यदि नीतीश ऐसा करते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया में लालू गठबंधन तोडऩे जैसा गंभीर कदम उठा सकते हैं। बिहार विधानसभा में लालू के पास 80 सीटें है जबकि नीतीश के पास 71 सीटें हैं लिहाजा बढी पार्टी होने के चलते लालू नीतीश के आगे न झुके तो प्रदेश में संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा। 

भाजपा के लिए इस पूरे घटना क्रम में चित्त भी मेरी और पट्ट भी मेरी वाली स्थिती है। यदि लालू झुकते हैं और उनके बेटे कैबिनेट से बाहर आते हैं तो लालू की सियासी ताकत कम हो जाएगी और यदि लालू गठबंधन तोड़ते हैं तो राज्य की सत्ता की चाबी भाजपा के हाथ आ जाएगी। भाजपा के पास विधासभा में 53 सीटें हैं और यदि भाजपा नीतीश को समर्थन दे देती है तो नीतीश लालू के बिना भी राज्य के मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। 

भाजपा नहीं देगी समर्थन

बिहार के पूरे घटना क्रम पर भाजपा की करीबी नजर बनी हुई है लेकिन राजनीतिक विशलेशकों का मानना है कि भाजपा इस स्थिती में नीतीश कुमार को समर्थन नहीं देगी। हालांकि भाजपा की सहयोगी लोकजन शक्ति पार्टी के प्रमुख रामविलास पासवान बार-बार नीतीश को एनडीए के साथ आने का न्यौता दे चुके हैं लेकिन इसके बावजूद नीतीश को समर्थ न देने का फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने करना है। 

इंतजार करेगी भाजपा

लालू द्वारा समर्थन वापिस लेने की स्थिती में भाजपा तुरंत नीतीश का हाथ पकड़कर उन्हें राजभवन नहीं पहुंचाएगी। यदि ऐसा हुआ तो नीतीश के साथ साथ भाजपा की भी बदनामी के आसार हैं। भाजपा के समर्थन देने की स्थिती में ये संदेश जाएगी कि केंद्र सरकार ने बिहार में गठबंधन तुड़वाने के लिए सीबीआई के माध्यम से लालू की छवि खराब करने की कोशिश की है लिहाजा ये दांव उल्टा भी पड़ सकता है। भाजपा कम से कम तीन महीने का इंतजार करेगी और लालू परिवार के खिलाफ ठोस सबूत सामने के बाद नीतीश को समर्थन पर फैसला ले सकती है। ऐसी स्थिती में बिहार में तीन महीने तक राष्ट्रपति शासन लगा रह सकता है। 

गुजरात के साथ बिहार के चुनाव

भाजपा के लिए 40 लोकसभा सीटों वाला बिहार राजनीतिक रुप से काफी अहम है। बिहार के मौजूदा संकट का इस्तेमाल भाजपा 2019 की जमीन तैयार करने के लिए कर सकती है। बिहार में लालू ने समर्थन वापिस लिया तो भाजपा राज्य में राष्ट्रपति शासन का दांव खेलने का विकल्प भी आजमा सकती है। ऐसे स्थिती में बिहार में हिमाचल और गुजरात के साथ दिसंबर में मध्यवधी चुनाव हो सकते हैं। 2015 के चुनाव में लालू नीतीश और कांग्रेस एक साथ थे, लेकिन अगले चुनाव में इन तीनों के साथ होने की संभावना कम हो जाएगी जिसका भाजपा को फायदा हो सकता है। 

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