Saturday, July 1, 2017

पालिका के छोटे बाबू की नौकरीफर्जीवाड़े के हाथी जैसे सबूत

नगर पालिका सूरतगढ़ का कनिष्ठ लिपिक यानि कि छोटा बाबू जिसके सर्विस के पहले दिन से चले भ्रटाचार ने हाथी जितना बड़ा रूप धारण कर लिया जिसके सरकारी दस्तावेजों के पक्के सबूत हैं।

 सुरेश गुप्ता के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी थी कि वह घुमाता और अधिकारी उस के जाल में फंसते चले गए।फर्जीवाड़े से उसने नौकरी प्राप्त की और न जाने किस किस प्रकार के भ्रष्टाचारों से बार बार पकड़ में आते हुए भी नौकरी को बचाता चला गया। लेकिन उसका हाथी निकल गया और पूछ फंस गई सेवानिवृत्ति के कुछ माह पहले तक वह बचता रहा मगर 23 जून  2017 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के छापे ने सब कुछ हिला कर रख दिया। जादू की छड़ी के अजब गजब  किस्से पढ़ते और सुनते थे लेकिन यह सच नगरपालिका सूरतगढ़ में वास्तव में ही हुआ। उत्तर प्रदेश निवासी सुरेश चंद्र गुप्ता नगरपालिका सूरतगढ़ में एक साधारण प्रार्थना पत्र देता है।विश्वसनीय सूत्रों से मालूम हुआ है कि नगरपालिका में कनिष्ठ लिपिक का एक पद रिक्त है और वह विकलांग है उसे नौकरी इस पद पर दे दी जाए। नगर पालिका का प्रशासन उस एकमात्र आवेदन पर कार्यवाही शुरु कर देता है। अन्य किसी से आवेदन नहीं मांगे जाते और राजस्थान सरकार के श्रम एवं रोजगार कार्यालय से किसी प्रकार की राय नहीं ली जाती और न सूचना दी जाती है। उस आवेदन पर रिपोर्ट होती है कि नगरपालिका में स्टोर कीपर का पद है।जादुई छड़ी काम करती है। सुरेश गुप्ता को दि. 18-2-1982  को नौकरी पर लगा दिया जाता है। सुरेश गुप्ता की ओर से नगर पालिका में विकलांग का प्रमाण पत्र दिया जाता है जिसकी प्रमाणिकता ही संदेश भरी है ।यह प्रमाण पत्र राजस्थान सरकार के अधिकृत चिकित्सक की ओर से जारी किया हुआ नहीं और सरकारी प्रपत्र पर भी नहीं ।इस पर हस्ताक्षर मोहर भी नहीं, जारी करने वाले अधिकारी का नाम भी नहीं। सूचना के अधिकार में जो प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ वह यहां दिया जा रहा है जो केवल अंग्रेजी में टाइप किया हुआ है। इस पर नगर पालिका की कोई रिसिप्ट  तिथि नहीं क्रमांक नहीं, किसी अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं, लेकिन यह फाइल में था। सुरेश चंद्र गुप्ता को 3 -3 माह के अस्थाई तौर पर लगाया जाता रहा।

सुरेश चंद्र गुप्ता की अनियमित नियुक्ति पर स्वायत शासन विभाग के बीकानेर स्थित क्षेत्रीय सहायक निदेशक को मालूम पड़ता है। उस कार्यालय से 26 अक्टूबर 1987 को नगरपालिका सूरतगढ़ के अधिशासी अधिकारी को पत्र दिया जाता है। पत्र का जवाब 2 नवंबर 87 तक आवश्यक रूप से देना होता है। सहायक निदेशक ने उक्त पत्र में पूछा सुरेश चंद्र गुप्ता को जब 18 फरवरी 1982 को नौकरी पर लगाया गया था,क्या उस समय कनिष्ठ लिपिक का पद स्वीकृत खाली था, सूचनानुसार कोई पद रिक्त नहीं था,अगर स्वीकृत पद भरे हुए थे तो क्या अतिरिक्त पद के लिए विभाग से स्वीकृति ली गई थी? सुरेश गुप्ता विकलांग कोटे में लगाया गया, उसका विकलांग प्रमाण पत्र क्या राजस्थान सरकार के सक्षम चिकित्सा अधिकारी द्वारा जारी किया गया था और क्या वह प्रमाण पत्र निर्धारित प्रपत्र में था?यह पद विकलांग कोटे में भरा गया, क्या यह राजस्थान के विकलांगों के लिए था या पूरे भारत के विकलांगों के लिए था, क्योंकि नियुक्ति दी गई वह व्यक्ति उत्तर प्रदेश का निवासी है। यह पत्र पूर्ण रुप से सुरेश चंद्र गुप्ता की नौकरी पर खतरा बना था लेकिन इसका जवाब उस समय के अधिशासी अधिकारी ने दिया या नहीं दिया? इसका कोई उल्लेख नहीं मिल रहा उस समय जो भी अधिशासी अधिकारी था निश्चित रुप से सुरेश चंद्र गुप्ता की पकड़ में था।सुरेश चंद्र गुप्ता के विरुद्ध उस समय कार्यवाही हो जाती लेकिन नहीं हुई।सुरेश चंद्र गुप्ता नगर पालिका के अधिशासी अधिकारियों और अध्यक्षों को न जाने कैसे प्रभावित करता रहा और अपनी नौकरी को बचाता रहा।

 आश्चर्यजनक तरीके से 24 अप्रैल 1997 को तत्कालीन अधिशासी अधिकारी ने सुरेश चंद्र गुप्ता को स्थाई नियुक्ति प्रदान कर दी। उस समय नगरपालिका में बोर्ड कार्यरत था जब बोर्ड कार्यरत होता है तब बोर्ड की अनुमति जरूरी होती है। यानी कि अध्यक्ष की अनुमति जरूरी होती है और नियुक्ति पत्र की सूचना अध्यक्ष को भी दी जाती है,

 लेकिन सुरेश चंद्र गुप्ता को स्थाई किया गया  उसकी प्रति अध्यक्ष को दी जाने का कोई उल्लेख नहीं है।स्थाई करण का पत्र जारी किया गया तब गुप्ता को क्या वेतनमान दिया जाना चाहिए इसका भी कोई नियुक्ति पत्र में उल्लेख नहीं है। केवल इतना लिखा गया है कि स्वायत शासन विभाग ने पत्र जारी किया था 31 दिसंबर 84 से पूर्व जो लगे हुए कर्मचारी हैं उनको स्थाई करना है। कोई लायक है अथवा स्थायीकरण के लायक नहीं है इसकी कोई रिपोर्ट फाइल पर किस ढंग से लिखी गई जिसमें गुप्ता को बचाया गया और स्थाई किया गया। सुरेश चंद्र गुप्ता रिश्वत प्रकरण में एसीबी द्वारा पकड़ में आया मुकदमा नंबर 336 उस पर कायम हुआ और 25 नवंबर 2002 को सस्पेंड किया गया। उस प्रकरण में मामला कैसे खत्म हुआ और कैसे बाहर हुआ यह आश्चर्यजनक है।

 सुरेश चंद्र गुप्ता के दागी होने की कहानी का विस्फोट हुआ।सुरेश चंद्र गुप्ता का सेवा कार्यकाल पूरा होने जा रहा था।केवल सात-आठ महीने की बाकी बचे  कि 23 जून 2017 को एसीबी ने पत्रकार कृष्ण सोनी आजाद की शिकायत पर छापा मारा और नगर पालिका से सारे दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए।सुरेश चंद्र गुप्ता के भ्रष्टाचार का सारा पिटारा एसीबी द्वारा कब्जे में ले लिया गया।इसे कहते हैं की हाथी निकल गया और पूंछ फंस गई। और जब वह फंसती है तो बड़ी दुखदाई होती है। वह काटी नहीं जाती और जेल में पहुंचा देती है। गुप्ता की अस्थाई नियुक्ति 18 फरवरी 1982 को होती है और 36 साल गुजरने के बाद वह 23 जून 2017 को पकड़ में आता है। जादू की छड़ी का असर खत्म, एसीबी की जांच शुरू।

गुप्ता से संबंधित दस्तावेज यहां दिए जा रहे हैं। पाठकगण गौर कर सकते हैं।






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