बुधवार, 7 जून 2017

अखबारों के मालिक मालकिन मुकदमों व जेल के लिए तैयार रहें





- करणी दान सिंह राजपूत -
एक जून 2017 से केंद्र सरकार प्रिंट मीडिया पर शिकंजा कसना शुरू कर चुकी है। इस वर्ष डीएवीपी की विज्ञापन नीति में बदलाव हुआ है। नियमानुसार चलने वाले प्रेस के लिए अंक निर्धारित किए गए हैं। इस नीति से शुद्ध तौर पर उन्हें फायदा होगा जो ए ग्रेड के प्रेस हैं। जिनका प्रसार प्रतिदिन 75 हजार से ऊपर है। शत-प्रतिशत कर्मचारियों का पीएफ कट रहा है। मौजूदा सर्वे में कई प्रेस इस दायरे में नहीं आए। इसलिए इनका एक जून से डीएवीपी विज्ञापन बंद कर दिया गया।
 यह सर्वे दो सालों के लिए हुआ है, इसलिए 2019 तक कोई परिवर्तन संभव नहीं होगा जिनके अखबार विज्ञापनों से रद्द कर दिए गए हैं वे चाहे जितना जोर लगाए।
ये हो सकता है कि कुछ प्रेस मालिक फिर से मेहनत कर सरकार से नए तरीके से सर्वे करने की गुजारिश करें। या नए प्रेस खोले जाएं जिनका प्रसार 75 हजार से ऊपर रखा जाए।

प्रेस में भूत करते हैं काम!

केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने का  डिजिटल इंडिया के तहत लेन-देन पूरा हिसाब डिजिटल करने का प्रयास कर रही है।

अख़बार की प्रेस में कर्मचारियों का शोषण करने,  अपने कर्मचारी ना दिखाने, पीएफ ना काटने की तमाम बुराइयां हैं। कोई जांच करने जाता है तो पता चलता है कि इस प्रेस में एक भी कर्मचारी नहीं है, फिर भी इसका सर्कुलेशन नंबर वन या अग्रणी बताया जाता है।
कुछ  कर्मचारी इतने उन्नत हैं कि एक साथ कई अख़बारों की रिपोर्टिंग, एडिटिंग कर लेते हैं। इन सब पर 2018 तक लगाम लग सकती है।
कई अखबार प्रेस बंद हो जाएंगे जो 1-2 हजार छापते हैं तथा 10,20,30, 40 हजार और इससे भी अधिक कॉपियां दिखाते हैं, ना कागज आता है,ना कागज का स्टोर है। सारा कुछ फर्जीवाड़ा।
कागज के बिल फर्जी। उनसे भी पूछा जाएगा कि कागज का बिल जो पूर्व में भुगतान दिखाया गया है वह  केसे भेजा गया व कागज का आदेश अब दिया। अखबार मालिक फर्जी रिकॉर्ड दस्तावेज तैयार कर सरकार को पेश करने के धोखाधड़ी के मुकदमों में भी फंसेंगे। या अपनी फर्जी दुकानदारी समय रहते बंद कर देंगे।
बस आगे-आगे देखते रहें।

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