शुक्रवार, 26 मई 2017

मोदी के तीन मंत्री अरुण जेटली, सुरेश प्रभु, राधा मोहन सिंह, नाकाम रहे

मोदीफेस्ट’ नाम से केंद्र सरकार अपने तीन साल पूरे होने का जश्न मना रही है। भाजपा इस दौरान तीन सालों की उपलब्धियां गिनाने में जुटी है, कुछ मंत्रियों का काम शानदार रहा, तो कुछ फ्लॉप रहे। वे अपनी जिम्मेदारी संभालने में नाकाम साबित हुए।

 अरुण जेटलीः

  नोटबंदी को ऐतिहासिक फैसला बताकर मोदी सरकार ने 500 व 1000 के पुराने नोट बंद किए, उसी ने वित्त मंत्री अरुण जेटली के ढीले-ढाले रवैये और लापरवाही को उजागर किया। नोटबंदी को लेकर सरकार ने कई बार स्टैंड बदला था, जिससे साफ था कि वित्त मंत्रायल ने इस बड़े फैसले का गहराई से अध्ययन नहीं किया था। आलम यह था कि लोग कैश की किल्लत के लिए घंटों एटीएम-बैंक के चक्कर काटते फिरते नजर आते थे। पैसे पाने के अलावा बैंकों में ड्राफ्ट, चेक और एंट्री जैसे अन्य काम भी प्रभावित हुए थे। अनऔपचारिक बातचीच में सरकार के कई मंत्री भी स्वीकार चुके हैं कि वित्त मंत्रालय से उन्हें उतनी मदद नहीं मिल रही, जितनी वे उम्मीद करते हैं। यह भी कई क्षेत्रों के काम प्रभावित करने का अहम कारण बन रहा है। इसके अलावा वित्त मंत्रालय की छवि उस मंत्रालय के रूप में बनी, जो कई संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए संकट बना। उदाहरण के तौर पर पहले भारतीय रिजर्व बैंक को नीतिगत दर तय करने में जहां आजादी थी, वह अब सरकार ने सीमित कर दी है। इसके लिए सरकार ने समिति बनाई है।

सुरेश प्रभुः

 शिवसेना से भाजपा में लाकर रेलमंत्री बनाए गए प्रभु शुरुआत के दो सालों में जरूर हिट रहे हों, लेकिन तीसरे साल उनका रिपोर्ट कार्ड लचर नजर आया। बुलेट ट्रेन का अधूरा सपना, रेलवे स्टेशन पर फैली गंदगी और हाल ही में हुए कई बड़े रेल हादसे इसकी प्रमुख वजह रहे। प्रभु कुछ ऐसे नियम लाए, जिससे यात्रियों को भारी घाटा हुआ। मसलन किसी कारणवश ट्रेन छूटने पर पैसे रिफंड न होना। पहले आधे पैसे रिफंड हो जाते थे। त्योहार के मौकों पर पहले चलने वाली स्पेशल ट्रेनों में सामान्य किराया होता था। केंद्र सरकार ने इनका नाम बदलने के साथ किराए में भी इजाफा कर दिया। फिर भी रेलवे की हालत पटरी पर आने का नाम नहीं ले रही।

राधा मोहन सिंहः

 केंद्र सरकार के तीन साल पूरे होने पर इसके कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह का काम बुरा बताया जा रहा है। किसानों को लेकर मोदी सरकार का सबसे बड़ा वादा 2022 तक किसानों की आय दोगुना करना है, लेकिन अब तक साफ नहीं हो सका है कि सरकार किसानों की असल आय दोगुनी करना चाहती है या नॉमिनल आय (महंगाई के कारण अपने आप बढ़ जाने वाली आय)। राष्ट्रीय सैंपल सर्विस ऑफिस ने भी स्वीकारा है कि छह साल में किसानों की नॉमिनल आय दोगुनी हो जाती है, लेकिन अभी तक यह बात जमीनी स्तर पर सच साबित होती नहीं दिखी। हैरान करने वाला एक आंकड़ा यह भी है कि थोक बाजार में जो दाल 50 रुपये किलो के आसपास है वह अभी भी हमें और आपको करीब 120 रुपये में खरीदनी पड़ रही है। इस समस्या का प्रमुख कारण बिचौलिए हैं, जिसके लिए भी सरकार तीन सालों में कोई खास उपाय नहीं कर सकी है।

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