Monday, March 13, 2017

पेटीकोट- कहानी - करणी दान सिंह राजपूत*



 नहीं है। ज्यादा बोले तो सजा ज्यादा बढ़ा दी जाएगी।- सर मेरी बात तो सुन ल।

जज रायचंद डागा ने मेरी ओर देखा और आरोप सुनाया।

 तुम अपनी पत्नी का पेटिकोट धोते हो।

मैं बोला। सर मेरी रिक्वेस्ट सुनें।
 मैं आगे बोलने वाला ही था कि उन्होंने बीच में टोक दिया। तुमसे जो पूछा जाय केवल उसका जवाब केवल हां ना में दें।ज्यादा बोलने की जरूरत तुम्हें एक बार कह दिया।दो बार कह दिया। अक्ल है कि नहीं है ? तुम केवल हां या ना में जवाब दो। पत्नी का पेटीकोट धोया था या नहीं? धोया था  तो बोलो हां। नहीं धोया  था तो बोलो ना।
मैं चुप हो गयी। मैं डर गया।मैं बताना चाहता था,मगर रायचंद डागा जी की अदालत कोई अलग नहीं थी। वही प्रक्रिया थी जो आम अदालतों में अपनाई जाती है।
काले कोट वाले वकील ने कहा जज साहब क्या कह रहे हैं?क्या पूछ रहे हैं? उसका जवाब दो। तुमने पत्नी का पेटीकोट धोया था या नहीं?
लकील भी वही वाक्य वही शब्द बोला जो जज ने कहा था।
वकील ने पुनः पूछा। तुमने पत्नी का पेटीकोट धोया था या नहीं? केवल हां या ना में जवाब दो। धोया था तो हां कहो नहीं धोया था तो ना कहो।
 मैं वकील का मुंह देखने लगा। कोई सुनने को तैयार नहीं था।
अदालत में वकील प्रश्न पर प्रश्न करते जाते हैं और पूरी बात जानने की कोशिश नहीं करते। अपने आरोपों  को साबित करने के लिए कठघरे में खड़े आरोपित से केवल हां या ना में ही उत्तर चाहते हैं।
मैं आरोपी था।मैं चुप था।
मैं क्या बोलता।पत्नी का पेटीकोट धोया था, मगर क्या हालत थी.....अभी बखान करने की सोच ही रहा था कि हां कहूं या ना कहूं।अगर ना कहता हूं तो चल जाएगा। लेकिन घर में जो ठप्पा है, जनता में जो ठप्पा है सच बोलने का उसका क्या होगा?मेरी आत्मा में ग्लानी होगी। अदालत में झूठ बोला।
मैंने निर्णय किया मन ही मन में  कि इस सच को बोल दूं।
मैं सोच रहा था कि जज रायचंद डागा ने मुझे घूरा और कहा कि जल्दी बोलो।अदालत का वक्त जाया करने की जरूरत नहीं है। जल्दी से बोलो पत्नी का पेटीकोट धोया था या नहीं धोया था? केवल हां और ना में जवाब देना।

जज ने जल्दी से बोला और मैंने जल्दी से उत्तर दे दिया।
हां।
उसके साथ ही मेरे मुंह से पूरा वाक्य निकल गया।धोया था पत्नी का पेटिकोट।
पूरी अदालत में हंसी के फव्वारे छूट पड़े।
हंसी का शोर अदालत के कमरे में गूंज उठा।
जज रायचंद डागा ने मेज पर हथौड़ी बजाई। कुछ देर में अदालत के कमरे में शांति  छा गई।
 सामने खड़े काले कोट वाले वकील ने मेरे से कहा तो तुम स्वीकार करते हो की पत्नी का पेटीकोट धोया था। तुम पर किसी ने दबाव नहीं डाला है।तुम्हें डराया नहीं, धमकाया नहीं।
तुम अपनी इच्छा से यह स्वीकार करते हो की तुमने पत्नी का पेटीकोट धोया। तम्हें इसकी सजा दी जाएगी। वकील चुप हुआ।
एक बार फिर अदालत में शोर हुआ।
जज रायचंद डागा ने फिर मेज पर हथोडा बजाया।
जज साहेब बोले।
शांत।शांत। अगर किसी ने शोर किया तो अदालत से बाहर निकाल दूंगा। सभी चुप बैठे रहें।अदालत का कमरा एक दम शांत हो गया।
सब चुप हो गए।
जज रायचंद डागा ने मेरी तरफ देखा और कहा कि तुमने भरी अदालत में यह आरोप पत्नी का पेटीकोट धोते हो स्वीकार किया है। तुम्हे इसके लिए दंड मिलेगा। तुमने समाज के नियमों को तोड़ा है। तुम्हें इसकी सजा जरूर और जरूर सुनाई जायेगी। समाज के नियम तोड़ना बहुत गंभीर अपराध है।अब तुम सजा सुनने के लिए तैयार हो।
मैंने अदालत के पूरे कमरे में नजर घुमाई कि कोई तो मेरे साथ होगा लेकिन कोई भी मेरे साथ नहीं था। सब मुझे हंसी का पात्र बनाने में मजा ले रहे थे। सभी के चेहरों से लग रहा था कि वे सब मुझे दंडित होते हुए देखना चाहते थे। मैं क्या कहूं? क्या बखान करूं? मेरे मित्र उनमें थे। कुछ अड़ोस पड़ोस के लोग भी थे। राजनीतिक कार्यकर्ता,सामाजिक कार्यकर्ता, अनेक प्रतिष्ठित जन मौजूद थे। उनमें वे लोग भी थे जिनके मैंने बहुत काम करवाए  व खुद ने किए थे।उनकी समस्याओं का हल किया था, लेकिन आज सभी भरी अदालत में मुझे दंडित होते हुए देखने को उतावले हो रहे थे।
आखिर जज ने एक बार फिर हथोड़ा बजाया और मेरा नाम लेकर कहा। तो तुम अब सजा सुनने के लिए तैयार हो?
मैंने जज साहब से हाथ जोड़कर निवेदन किया। आप मुझे पत्नी का पेटीकोट धोने की जो सजा देंगे वह मुझे मंजूर होगी। लेकिन आप एक बार मेरी बात को सुनलें।
जज ने मेरी तरफ देखा और रहम किया। बोलो तुम क्या बोलना चाहते हो, लेकिन यह ध्यान रखना तुम्हारे बोलने से अदालत प्रभावित नहीं होगी। अदालत भावनाओं में नहीं बहेगी। तुम्हें जो सजा सुनाई जाएगी। वह सुनाई ही जाएगी और जरूर सुनाई जाएगी। अदालत को भावनाओं में बहाने की कोशिश मत करना। अदालतें भावनाओं में फैसले नहीं करती। तुम्हारा अपराध तुमने खुद ने भरी अदालत में स्वीकार कर लिया है। तुमने पत्नी का पेटीकोट धोया था। अब बोलो तुम क्या कहना चाहते हो?
मैंने जज रायचंद डागा की तरफ देखा।
एक बार पुनःअदालत में बैठे महानुभावों को देखा और फिर मैं बोला।
जज साहब हमारे घर में वाशिंग मशीन है जिस पर घटना वाले दिन पत्नी कपड़े धोने में लगी हुई थी।वाशिंग मशीन मैं कपड़े धुल रहे थे।वाशिंग मशीन चल रही थी। इतने में डोर बेल बजी। दरवाजे पर कोई आया है। पत्नी ने मुझे पुकारा मैं दूसरे कमरे बैठक में बैठा था।
पत्नी की आवाज आई- सुनते हो, थोड़ा मशीन पर आना।मैं दरवाजा खोलने जा रही हूं। कपड़े निकाल कर ड्रायर में डाल देना।
 मैं मशीन पर गया। मुझे मालूम नहीं था कि मशीन में क्या धुल रहा है।
मैने मशीन को रोका और टब में से कपड़े निकाल कर ड्रायर में डालने लगा।
इतने में ही पत्नी के साथ मशीन के पास पड़ोसन आ गई।मैं कपड़े निकाल कर ड्रायर में डाल रहा था,उन कपड़ों में पत्नी का पेटिकोट भी था।मेरे सफेद कपड़ों पर पड़ोसन की नजर गई या नहीं गई लेकिन लाल रंग के पेटीकोट पर नजर चली गई। पड़ोसन ने उस समय हंसी में पत्नी से कहा ,अरे तुम्हारी तो मौज। तुम अपने पति से कपड़े धुलवाती हो और पेटीकोट भी।
पड़ोसन ने यह बात पड़ोस में फैला दी। बस इतनी सी बात थी जिसका पहले मोहल्ले में हल्ला हुआ फिर समाज में हुआ और मैं दोषी बना दिया गया। समाज के जाने माने लोगों ने पूछा तो मैंने हां कर दी। इसमें ना करने जैसी कोई बात मुझे नजर नहीं आई।
 जज साहब मैं यह ध्यान दिलाना चाहता हूं। किसी पर आरोप नहीं लगा रहा, लेकिन केवल जानना चाहता हूं कि घर में पति-पत्नी दो ही हो और पत्नी बीमार हो जाए। तब उसके कपड़े कौन धोएगा? फिर आजकल तो थापी सोटे से कोई कपड़े नहीं धोता।वाशिंग मशीन में डाल देते हैं और बिजली का बटन दबा देते हैं। कपड़े धुल जाते हैं।
 जज साहब पत्नी की बीमारी में मैंने पहले थापी सोटे से जब कपड़े धोए तब कोई बवाल नहीं मचा। किसी ने देखा नहीं था।
 जज साहब।क्या अदालत  जितने लोग बैठे हैं, इन्होंने कभी अपनी पत्नी का पेटीकोट नहीं धोया होगा। लेकिन यह आरोपित नहीं है। एक बार अदालत में शोर सा हुआ।
जज ने कहा तुम्हें किसी भी व्यक्ति पर आरोप लगाने की कटाक्ष करने की इजाजत नहीं है। तुम केवल और केवल अपनी बात कहो जिसकी इजाजत दी गई है।
जज साहब मैंने जाने अनजाने में यह कहा है लेकिन यह सच्च तो है। मैं माफी चाहता हूं।
मैं स्वीकार करता हूं। एक बार फिर कहा मैंने पत्नी का पेटिकोट धोया था। आप जो चाहे सजा सुनाएं। मुझे वह सजा कबूल होगी मंजूर होगी। मैं सजा का पालन करने का वादा करता हूं ।
जज रायचंद डागा नामी जज बड़े सुलझे हुए मगर जज की कुर्सी पर बैठने के बाद उनका रुतबा ही कुछ और हो जाता था।
सारे इलाके में रायचंद डागा का नाम और उनकी सजा से सभी डरते थे।
मैं उनके सामने सजा सुनने को तैयार खड़ा था।
उन्होंने एक बार हथोड़ा बजाया।
अदालत में शांति छा गई और अदालत में उपस्थित सभी लोग एकटक जज की तरफ देखने लगे।
मैं भी सजा सुनने के लिए तैयार था।
रायचंद डागा जज ने सजा सुनाई।
तुम पत्नी का पेटीकोट धोने का आरोप स्वीकार कर चुके हो।अब तुम्हें जो सजा सुनाई जा रही है वह ध्यान से सुनो, और उस पर कोई सवाल जवाब की इजाजत नहीं होगी।
 जज ने सजा सुनाई "तुम आगे कभी अपनी पत्नी का पेटीकोट नहीं धोओगे।
मैं जज साहब को देखने लगा।
मैंने रिक्वेस्ट की सर इस निर्णय से तो मेरी बदनामी होगी।मेरा निवेदन सुनें। अदालत में शोर होने लगा जल्दी ने फिर हथोड़ा बजाया। अदालत में शांति हुई।
मैंने रिक्वेस्ट की।जज साहब मैं आपसे बार-बार हाथ जोड़कर निवेदन करना चाहता हूं कि इस फैसले से तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा। मेरी बदनामी होगी। आपने यह कैसा फैसला सुना दिया?
 आप ने सुनाया है कि आगे से कभी अपनी पत्नी का पेटिकोट नहीं धोऊं।
जज साहब मेरा एक निवेदन है। आप इस वाक्य में से केवल एक शब्द "अपनी" बस यही शब्द काटने का रहम करें। जज साहब मैं आपके निर्णय पर कोई आपत्ति नहीं करना चाहता लेकिन आपने जो निर्णय दिया कि मैं आगे से अपनी पत्नी का पेटीकोट नहीं धोऊंगा। इससे लोग यह निर्णय निकालेंगे कि मुझे दूसरों की पत्नियों का पेटीकोट धोने की मनाही नहीं है।मेरे पर रहम फरमाएं।
जज ने कड़ी नजरों से मेरी तरफ देखा और कहा कि तुम्हें कितनी बार समझाया गया है। तुम अदालत के फैसले पर आपत्ति कर रहे हो। अदालत जो फैसला दे चुकी है वह आज और इसी समय से लागू हो गया है। तुम्हें जो कुछ कहना है तो बड़ी अदालत में अपील में कहना। तुम्हें अपील करने की इजाजत दी जाती है।
 इस अदालत का यही निर्णय है कि तुम आगे कभी अपनी पत्नी का पेटिकोट नहीं धोओगे।
मैं नोटबंदी में फंस गया। बैंक में बचत खाते में से भी खुद की ही रकम निकाल नहीं पाया। शर्म मरते किसी दोस्त से भी रूपये मांग नहीं पाया।मैं बड़ी अदालत में अपील में नहीं जा पाया।
जज रायचंद डागा का फैसला लागू रह गया कि मैं "अपनी"  पत्नी के पेटीकोट नहीं धो सकता।

***************** काल्पनिक **************

 *होली की शुभकामनाएं सहित यदि आपको मसखरी -हास्य पसंद है तो आगे शेयर करें।

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करणीदानसिंह राजपूत,
स्वतंत्र पत्रकार,
 सूरतगढ़।
मो 94143 81356.
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