Sunday, February 5, 2017

बीकानेर में पासपोर्ट कार्यालय मगर गंगानगर में मेडिकल कॉलेज क्यों नहीं और राजस्थानी को मान्यता क्यों नहीं



-  करणीदान सिंह राजपूत  -

केंद्रीय सरकार ने बीकानेर में पासपोर्ट कार्यालय खोलने की घोषणा की है। इस पर इलाके के कई लोगों ने राज्य वित्त मंत्री बीकानेर से सांसद अर्जुन राम मेघवाल को बधाइयां दी हैं। सुविधाएं निश्चित रूप से मिलनी चाहिए।
बीकानेर में पासपोर्ट कार्यालय खुलने की घोषणा पर बधाइयां दी जाने पर मेरी तरफ से एक सवाल है। कितने लोग विदेशों की यात्रा करते  हैं?
उस कम संख्या पर सरकार का इलाके के जनप्रतिनिधियों का बहुत ध्यान है, लेकिन लाखों लोगों के लाभ पहुंचा सकने वाले श्री गंगानगर में मेडिकल कॉलेज खोलने के मामले में सबकी चुप्पी है।
 मेडिकल कॉलेज खुलता है तो उसका लाभ बहुत अधिक, अधिक से अधिक जनता को मिल सकता है। लेकिन   इस लाभ पहुंचाने वाले मुद्दे पर राजनेता चुप्पी धारण किए हुए हैं। श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज की अत्यंत आवश्यकता है जिसको जानबूझकर टाला जा रहा है।

इससे पहले भी श्रीगंगानगर  व हनुमानगढ जिलों को दुत्कारे जैसी स्थिति में रखा जाता रहा है।
इस इलाके में पहले मांग उठी कि यहां पर कृषि विश्वविद्यालय खोला जाए लेकिन यह मांग पूरी नहीं की गई। पहले  मोहनलाल सुखाड़िया अपने उदयपुर में ले गए। इसके बाद दूसरी बार हुई तब बीकानेर को दे दिया गया।
श्री गंगानगर में मेडिकल कॉलेज खोले जाने की मांग है लेकिन उसकी पूर्ति नहीं की जा रही। बस इतना बता दिया जाए कि यह मांग बहुत कमजोर क्यों है?
सवाल बस इतना सा ही है की विदेश जाने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है उस पर तो ध्यान है लेकिन अधिक संख्या वाले महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान नहीं है।

कहा जा सकता है कि पासपोर्ट कार्यालय तो केंद्र सरकार की तरफ से खोला गया है और मेडिकल कॉलेज राजस्थान सरकार की ओर से खोले जाने का विषय है। लेकिन जनप्रतिनिधि राजनेता जो इस इलाके में बसते हैं वे केंद्र में और राजस्थान में दोनों स्थानों पर वर्चस्व रखते हैं। मेडिकल कॉलेज की मांग गंभीरता से पूरी की जानी चाहिए ताकि श्री गंगानगर हनुमानगढ़ दो जिलों को ही नहीं उससे बीकानेर संभाग को लाभ मिलने वाला है।

 अर्जुनराम जी मेघवाल को पासपोर्ट कार्यालय की घोषणा होने पर बधाईयां देने वाले facebook मित्र कोई बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन यदि राजस्थानी भाषा को केंद्र सरकार द्वारा मान्यता दी जाती तो सारा राजस्थान बधाई देने वाला होता। राजस्थानी भाषा को मान्यता देने का मामला भी आगे से आगे टाला जा रहा है क्यों? क्या राजस्थान के लोगों के वोटों की आवश्यकता केंद्र और राजस्थान की सरकारों को नहीं है?

अर्जुन राम जी मेघवाल ने ही बड़े विश्वास से कहा था की संसद के शीत कालीन अधिवेशन  फरवरी 2016 में राजस्थानी भाषा को मान्यता मिल जाएगी लेकिन अब तो फरवरी 2017 भी आश्वासन में ही निकल जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र जी मोदी को ज्ञापन देते फोटो भी छपे और आशा भी जगी लेकिन न जाने राजस्थान का महत्व भूल जाते हैं। अन्य प्रांतों खासकर दक्षिण भारत का कोई भी मुद्दा हो कभी नहीं भुलाया जाता।

राजस्थानी भाषा की मान्यता और उससे मिलने वाली नौकरियों की राजस्थान के युवक और युवतियां बाट जोह रहे हैं। राजस्थानी भाषा की मान्यता मिलने पर निश्चित रुप से प्रशाशनिक सेवाओं में राजस्थान के लोगों को नौकरियां मिलेंगी और बहुत बड़ी बेरोजगारी दूर होगी।  यह मुद्दा ऐसा नहीं है कि राजनेता समझ नहीं रहे हैं। सभी समझते हैं लेकिन अपने पदों के लालच में वे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के आगे झुकते हैं जबान नहीं खोलते और उनके झुकने से राजस्थान के करोड़ों लोगों को लाभ से वंचित रहना पड़ रहा है।

 मेरा उद्देश्य एकदम साफ है। पाठक सरल भाषा में लिखे हुए इन मुद्दों को समझते भी हैं। अब यह अलग बात है कि उस पर कमेंट करना नहीं चाहते। कमेंट करते हुए भी डरते हैं कि फलां राजनेता मंत्री नाराज हो जाएगा। अगर इस प्रकार से डरते रहे तो इलाके को लाभ नहीं मिलेगा और आने वाली पीढ़ियां लाभ से वंचित रहेंगी। सोचना लोगों को है। किसी एक व्यक्ति को नहीं।
 जब भी इलाके में जनप्रतिनिधियों के मंत्रियों के दौरे हों तो उनको याद कराने के लिए पकड़ा ही जाए। लेकिन जो स्थानीय विधायक और सांसद है उनको भी झिंझोड़ा जाए। अधिकारों के लिए यह कार्यवाही जरूरी है। शक्ति के बिना केवल वोटों के समय हाजरी भरी जाती है और बाद में जनता को याद नहीं किया जाता।
 मुद्दे मैंने रखे हैं जिनसे जनता पूरी तरह से वाकिफ है।

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