गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

भारत में 20,00,00000 लोग रात को भूखे सोने को मजबूर भयावह और चिंतनीय हालत

 * करणीदान सिंह राजपूत *
भारत में गरीब लोगों के नाम पर अनेक योजनाएं चलती रही है और उन पर करोड़ों रुपए खर्च भी होते रहे हैं मगर हालत भयावह और चिंताजनक बनी हुई है। भारत में 37% लोग गरीबी रेखा से नीचे जीने को मजबूर हैं। देश की यह हालत संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं क्रषि संगठन की रिपोर्ट द स्टेट ऑफ सिक्योरिटी इन दी वर्ल्ड 2015 में दी गई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 20 करोड़ लोग रात को भूखे सोने को मजबूर हैं।

यहां रिपोर्ट पर मेरी सोच यह है।
 इन लोगों को एक समय जैसे तैसे भोजन मिल पाता है लेकिन रात को भोजन मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। ये लोग जब भोजन नहीं मिलने की स्थिति में है तो उनके ठिकाने भी नहीं है। लोग सड़कों पर रेलवे के खाली स्थानों पर बस स्टैंड के पास के खाली स्थानों पर ओवर ब्रिज के नीचे ठिकाने बनाते हैं। रोजाना कमाई के लिए इधर-उधर या शहरों की आसपास की कच्ची बस्तियों में झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले लोग हैं।

 जब भोजन ही मिलने का संकट हो तब इनके रहन सहन की हालत कितनी चिंताजनक होगी? इसका अनुमान सहज में लगाया नहीं जा सकता। रिपोर्ट में 20 करोड़ लोगों के रात को भूखे सोने का जिक्र है लेकिन यह संख्या इससे कहीं अधिक है। करोड़ों लोग रात्रि समय में कस्बों और शहरों में सामाजिक संस्थाओं धार्मिक संस्थाओं द्वारा लगाए गए लंगरों में भोजन पाते हैं। इसके अलावा विशेषकर गुरुद्वारों में सदा लंगर चलता रहता है वहां भी काफी संख्या में दिन और रात में लोग भोजन पाते हैं।
लंगरों और गुरुद्वारों में भोजन ग्रहण करने वाली जनता करोड़ों में है  यह मान कर चलना चाहिए। पूरे देश में 5-6 करोड़ की संख्या में लोग इस प्रकार के लंगर में भोजन प्राप्त करते हैं। इस प्रकार की भयावह स्थिति पूरी तरह से गौर की जानी चाहिए मगर कोई भी सरकार गंभीरता से इस पर ध्यान नहीं देती। हालांकि रोजगार उपलब्ध कराने के लिए देश में नरेगा जिसका नाम बदलकर अब महात्मा गांधी के नाम पर महानरेगा कर दिया गया है से रोजगार मिलता है मगर उसकी प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन रोजगार मिले यह गारंटी नहीं है। पूरे महीने में कुछ दिन रोजगार मिलता है और बाकी के दिन बेरोजगारी में बिताने पड़ते हैं। सरकार गरीब लोगों के लिए जो कर रही है उन पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। सरकारी महकमों में अर्ध कुशल और कुशल कामगारों को प्रतिदिन जितने रुपए सरकार की ओर से दिए जाते हैं, उससे काफी ज्यादा मेहनताना खुले काम करने में मिलता है। जब सरकार कामगार रखती है तो वह चाहे स्थाई हो चाहे अस्थाई हो उसको दिहाड़ी जिसे दैनिक वेतन कहते हैं वह बाजार में चल रही दरों पर दिया जाना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

यह ब्लॉग खोजें