Sunday, February 26, 2017

अखबारों की मौत भी तय हुई: प्रेस और कागज का भुगतान कालाधन:


चालीस पचास हजार से लाख तक प्रतिदिन नगद आना और प्रेस को नगद भुगतान हो जाना:

- 1 हजार छापना और 10 हजार से 50 हजार तक प्रतियों का फर्जी रिकार्ड तैयार करना: अब तक चलता रहा गोलमाल:
सरकारी विज्ञापनों वास्ते करते हैं फर्जी रिकार्ड:


अखबारों का सच्च भी जानिए- करणीदानसिंह राजपूत:

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केन्द्र की भाजपा सरकार के काले धन पर रोक लगाने की कार्यवाही में बहुत जल्दी कई दैनिक अखबारों की मौत भी तय है और अखबार के मालिक संपादक कानून के शिकंजे में फंसे हुए जेल की हवा भी खाऐंगे। यह अब एकदम तय है।
काला बाजारियों का सच्च जानने को उत्सुक रहते हैं तो अखबारों का सच्च भी जानिए कि कितना गोलमाल और फर्जीवाड़ा अखबारी धौंस व राजनेताओं की दोस्ती के दम पर किया जाता रहा है। अब यह चलने वाला नहीं है। और आपके आसपास के अखबारों पर गौर करें।
दैनिक अखबार को सरकारी विज्ञापनों के लिए आठ पृष्ठ छापना अनिवार्य और अधिक प्रतियां होंगी तब अधिक दर मिलेगी। इसके लिए किया जाता है फर्जीवाड़ा और उसकी फर्जी तस्दीक चार्टेड एकांऊटेंट तथा सरकारी कार्यालयों में बैठे पीआरओ व निदेशक आदि करते रहे हैं।
एक हजार प्रतियां छापने वाला अखबार विज्ञापनों की अधिक दर लेने के लिए अखबार की प्रतियां दस पन्द्रह हजार से पचास हजार तक छापनी बता देता है।
इसके लिए अखबार के कागज की खरीद का फर्जी बिल खुद ही किसी प्रेस से छपवाते हैं तथा खुद ही उसमें आदेश रकम आदि भरते हैं। कागज की ढुलाई के बिल भी फर्जी ट्रक नम्बर तक फर्जी। कागज मंगवाया ही नहीं तब बिल और ट्रक फर्जी ही होंगे। कागज विक्रेता का नाम भी फर्जी। किसी अन्य सही बिल की सही इन्द्राज को अपने नकली बिल में भरना आसान। जब कागज लाखों का आना बतलाया गया तब उसका भुगतान भी फर्जी। लाखों की रकम कहां से आई और कागज बेचने वाले के पास नगद कैसे चली गई? प्रेस वाला भी बिल नहीं देता। वह हजार छाता हे तो दस से पचास हजार तक छपाई का बिल क्यों दे? प्रेस का बिल भी फर्जी खुद कहीं छापते हैं और खुद ही उसमें रकम का देना तक भरते हैं। अखबार की यह रोकड़ कैसे तैयार हो जाती है? जब पैसे के लेन देन के कानून बने हुए हैं। नगद लेनदेन एक सीमा से ऊपर हो ही नहीं सकता तब अखबारों का कैसे होता है?
एक हजार छापने में और पचास हजार प्रतियां छापने में बिजली की खपत का अंतर भी होता होगा? जहां प्रेस है वहां रात को कोई हलचल भी नहीं हो तथा पचास हजार अखबार रात को प्रतिदिन छपने का रिकार्ड तैयार हो।
कागज का कोई स्टोर भी नहीं। अखबार के बंडल बनाने वाले,पहुंचाने वाले कोई भी नहीं। सभी फर्जी नाम। अखबारों के वितरण करने वाली एजेंसियां एजेंट तक के नाम अलग अलग जगहों के फर्जी और उसकी सूची भी फाइल में शामिल। एजेंटों के पास अखबार कैसे गया कैसे बेचा और उसका भुगतान कैसे आया? यह सब कमाल का फर्जीवाड़ा चौथे स्तंभ के आपके कई जानकार खास मित्र करते हैं। आश्चर्य यह भी है कि अनेक समाजसेवी व राजनेता आदि ऐसे महा भ्रष्ट पत्रकारों की पैरवी भी करते हैं।
लेकिन अब यह चलने वाला नहीं है। आपके मित्र अखबार वाले हैं और वे दस पन्द्रह हजार से पचास हजार तक की प्रतियां दिखाते हैं। जानकारी के लिए पूछ लें कि यह सब कैसे कर लिया जाता है?
और अधिक भी जानिए कि अनेक अखबार साप्ताहिक पाक्षिक रिकार्ड में हजारों छपते है और असल में फाइल की पचास कॉपियां। वे पाठकों के पास कभी नहीं आते। सरकारी विज्ञापन जारी होते हैं तब छापे जाते हैं और सीधे विज्ञापनदाता कार्यालय में बिल पहुंचा दिए जाते हैं।
मोदी का एक्सन प्लान भ्रष्टाचार में लिप्त अखबारों पर भी लागू होने वाला है। सरकार ने कुछ दिनों पहले कई प्रकार की जानकारियां ली हैं।
अखबारों के सच्च में कई अखबारों की मौत तय है।

13-11-2016
up date 26-2-2017.
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आज फस्ट अप्रेल भी नहीं है,कि यह मजाक हो।
जब यह समाचार लगाया था तब यह नोट भी लगाया था कि मजाक न समझें।
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अब कार्यवाही शुरू हो गई है।
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