Tuesday, July 11, 2017

क्या यही है मेरा शहर? कविता-करणीदानसिंह राजपूत



मेरा शहर बोलता नहीं
मेरा शहर देखता नहीं
मेरा शहर सुनता नहीं
अजब है मेरा शहर
घटनाओं पर घटनाएं
कुछ भी हो जाए
मेरे शहर की आँखें नहीं
सुनाओ किसे  कान नहीं
बोले कैसे मुंह नहीं।
अरे। इसका यह रूप
ताकत का यह स्वरूप
कंकाल कैसे हो गया?
सुना है कहानियों में
कंकाल भी बोल उठते हैं।


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2-9-2016.
अपडेट 5-5-2017.
अपडेट 11-7-2017.
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करणीदानसिंह राजपूत,
स्वतंत्र पत्रकार,
सूरतगढ़।

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