Sunday, August 13, 2017

राजस्थानी व हिन्दी के महान साहित्यकार ओम पुरोहित कागद को संस्मरण रूप श्रद्धांजलि:





एक दिन कागद उपनाम जुड़ गया और उनका जीवन भी कागद ही बन गया जो मृत्यु तक कागद ही बना रहा।

- करणीदानसिंह राजपूत -

सूरतगढ़। ओम पुरोहित कागद की यात्रा इस तरह से पूर्ण हो जाएगी किसी ने भी सोचा न होगा। वे कितने रूपों में अपना जीवन जी गए। पत्रकारिता अध्यापन और राजस्थानी हिन्दी में साहित्य सृजन, राजस्थानी साहित्य अकादमी की पत्रिका जागती जोत के संपादक,कविता पाठ,आकाशवाणी और दूरदर्शन में तथा मित्र जगत में तथा राजस्थानी मान्यता संघर्ष में उनकी स्मृतियां जीवित रहेंगी। 



ओमजी से मिलना तो शुरू हुआ सन् 1974 के आसपास।

मैं राजस्थान पत्रिका में कई सालों से जुड़ा हुआ तब ओमजी ने जून 1979 में अपनी ईच्छा प्रगट की। उनका आग्रह था कि राजस्थान पत्रिका में उनको भी संवाददाता बनवा दूं। मैंने ओमजी के लिए पत्र लिखा और कुछ दिन बाद प्रबंध संपादक विजय भंडारी जी का पोस्टकार्ड मिला कि ओमजी से कह कर ब्यौरा भिजवा दूं। ओमजी की ईच्छा पूर्ण हुई। 



वे केसरीसिंहपुर से संवाददाता बना दिए गए। उन दिनों वहीं पर परिवार का निवास था।

मिलना होता रहता था। वे कविताएं लिखते और स्थानीय अखबारों में छपती। श्यामजी चुघ का शास्वत सत्य पाक्षिक में 15 दिसम्बर 1980 को कविता छपी,तेरा रूप सजा दूं। यह अंक अभी मेरे पास पड़ा है।

कुछ साल बीते कि एक दिन ओमजी ने कहा कि चित्रकला में माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण को तृतीय श्रेणी अध्यापक लगाने का नियम है मगर राजस्थान शिक्षा विभाग नियुक्तियां नहीं कर रहा है। अधिकारी इस विषय पर बात तक नहीं करना चाहते। ओमजी ने कहा कि वे खुद तृतीय श्रेणी अध्यापक लगना चाहते हैं। उन्होंने चित्रकला में दसवीं परीक्षा उत्तीर्ण की हुई है। ओमजी ने मुझे कहा कि राजस्थान पत्रिका में कड़वा मीठा सच्च स्तंभ में इस बारे में लिखूं तो बात बन सकती है। कड़वा मीठा सच्च स्तंभ मेरा अतिप्रिय स्तंभ रहा। सन् 1988 में राजस्थान पत्रिका का प्रकाशन बीकानेर से भी होने लगा था। उस समय मिलाप कोठारी संपादक थे। उन्होंने यह स्तंभ शुरू करवाया था। स्तंभ में जो सामग्री छपती उसका सरकार व विभागों पर असर भी बहुत हुआ करता था। ओमजी ने शिक्षा विभाग की पत्रिका शिविरा में छपे आदेश आदि उपलब्ध करवाए। कड़वा मीठा सच्च स्तंभ में इस विषय पर मेरे दो लेख छपे। सरकार व विभाग तुरंत असर पड़ा। ओमजी की ईच्छा पूर्ण हुई और एक दिन वे अध्यापक बन गए।

उनकी नियुक्ति हुई। मैं उनसे मिलने के लिए हनुमानगढ़ टाउन के स्कूल में गया। स्कूल में जब अवकाश हुआ तब हम मिले।

ओमजी से साहित्य सम्मेलनों में कवि सम्मेलनों में मिलना होता रहता था।

उनके पुत्र की भी दुर्घटना में मृत्यु हुई थी। उनके निवास पर शोक व्यक्त करने गया लेकिन मुंह से तो शब्द ही नहीं निकल पाए। ऐसा वातावरण था। जब लौटने लगा तब उनके कंधे पर धीरज का हाथ रख कर लौट आया था। उनकी माताजी की मुत्यु पर भी गया था।

वे जब भी आकाशवाणी में कविता पाठ करने आते तब मिलना होता था।

कुछ समय पूर्व सूरतगढ़ में साहित्य सम्मेलन के रूप में 5 दिन का समारोह था। उसमें ओमजी पधारे थे और उन्हीं का पूरा कार्यक्रम था। तब उन्होंने बतलाया था कि कागद उपनाम क्यों जुड़ गया। उनके पिता की जेब में कागद भरे होते थे। ओमजी को लगता था कि कागदों में बड़ी खासियत होती है। बस वे भी अपनी जेब में कागद भर कर रखने लगे। उनमें लिखा हुआ कुछ भी नहीं होता था मगर बस जेब में रखते। एक दिन कागद उपनाम जुड़ गया और उनका जीवन भी कागद ही बन गया जो मृत्यु तक कागद ही बना रहा। 



:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

ओमजी 12 अगस्त 2016 को अपने एक साथी के साथ मोटरसाईकिल पर टिबी से हनुमानगढ़ लौट रहे थे कि किसी वाहन ने टक्कर मार दी। ओमजी दुर्घटना में गंभीर घायल हो गए और श्रीगंगानगर ले जाते समय रास्ते में संसार छोड़ गए।

::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::


प्रथम बार  लिखा 14- 8-2016.

अपडेट 13-8-2017.




No comments:

Post a Comment

Search This Blog