बुधवार, 27 अप्रैल 2016

मुस्कुराते आईये मुस्कुराते जाईये जरा मुस्कुराईये:उज्जैन कुंभ:शिप्रा नदी:


पं.विजयशंकर मेहता=हनुमंतवाटिका:
पंडित विजयशंकर मेहता 22 अप्रेल से शिव पुराण सुना रहे हैं और बीच बीच में अनेक उद्धरण भी देते रहते हैं। कथा के साथ ही भजन होता है।
एक भजन का मुखड़ा कहें या पंक्ति जो मानव जीवन को सार्थक करने वाली है और संपूर्ण भजन परिवार,समाज जगत को जोड़ देने वाला है। पंडित विजयशंकर मेहता इस भजन की व्याख्या भी करते हुए समझाते हैं कि केवल मुस्काने मात्र से अनेक समस्याओं का अंत हो जाता है और मुस्कान से बात हो और बात नहीं केवल मुस्कान का आदान प्रदान ही हो जाए तो समस्या पैदा ही न हो।
वे कहते हैं कि आज के व्यस्त जीवन में लोग इस प्रकार से ढलते जा रहे हैं कि मुस्कान से दूर होते जा रहे हैं। किसी को भी समय नहीं है। जिसे पूछो वह यही कहते हुए मिलता है कि समय नहीं है। लेकिन यह व्यस्तता सच नहीं है। मुस्कान तो पल की क्षण भी की ही बहुत होती है।
मुस्कुराते हुए रहें तो एक अवस्था ऐसी आ जाएगी कि बात चाहे न कर पाएं केवल एक दूजे को मुस्कान बिखेरते हुए देखते हुण् निकल जाऐंगे तो भी आँखों आँखों में ही हालचाल जान जाऐंगे।
पंडित जी सहज शब्दों में बतलाते हैं कि मुस्कुराते आएं हैं तो मुस्कुराते जाएं और ठहरें हैं तो जरा मुस्कुराते रहें।
मुस्कान से जीवन की सार्थकता है।
प्रस्तुतकर्ता- करणीदानसिंह राजपूत:

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