Monday, March 14, 2016

रेत में जन्मा नया नेता राकेश बिश्रोई


करणीदान सिंह राजपूत
इंदिरा गांधी नहर में से ऐटा-सिंगरासर माइनर निकाले जाने की
मांग अब पूरे जोश में है तथा इसे इतनी ऊंचाई तक पहुंचाने वाले
व्यक्ति राकेश बिश्रोई के नेतृत्व में अन्य छोटे-बड़े नेताओं को
एक कतार में लगा दिया है। रेत के समंदर में शक्तिशाली शूर पैदा
हो गया है जिसे सरकारी डंडे-गोली से रोका नहीं जा सकता।
राकेश बिश्रोई का झंडा सबसे ऊंचा हो गया है। अपनी मौत का
संदेश देते हुए अभी तक इलाके के अन्य नेता आगे नहीं आया था।
राकेश बिश्रोई ने ऐटा-सिंगरासर माइनर की मांग को
जोर-शोर से उठाकर इलाके की राजनीति को गरमा दिया है।
राकेश बिश्रोई ने इस मांग को उठाया तो राजनीतिक दलों के
नेता भी जुटे और कानौर हैड पर भाषण देने पहुंचने लगे। अभी
तक सभी चुप्पी साधे बैठे सोये थे, अगर राकेश बिश्रोई इसे शुरू
नहीं करता तो नेताओं की चुप्पी आगे के चुनाव पर जाकर टूटती।
इस मांग को और अधिक शक्तिशाली बनाने में बाकी नेताओं को
लगे रहना होगा। अब भी वे खिसकने में रहे तो जनता से कटे हुए
हैं तथा और दूर हो जाएंगे।
नेताओं के खतरा भांप कर खिसक जाने की प्रवृत्ति अच्छी नहीं है।
कानौर हैड पर पहले नेताओं ने जोश भरे वक्तव्य दिए और पुलिस
की कार्यवाही में केवल निर्दोष ग्रामीण किसान ही शिकार हुए।
बड़े नेता वहां नहीं थे। पुलिस लाठी गोली बरसा रही थी तब नेता
नहीं थे। अगर नेता वहां होते तो एक आध लाठी गोली उनके भी
लगती।
मान लेते हैं कि पुलिस ने उन पर लाठी नहीं चलाई। यह भी मान लेते
हैं कि लाठी गोली ही समझदार हो गई और स्वयं नियंत्रित हो
गई और बड़े नेताओं की तरफ नहीं घूमी। लेकिन ये नेता इस
घटना को अपने मोबाइल कैमरों में शूट तो कर लेते ताकि इसे
कहीं भी उपयोग में लाया जा सकता। अखबारी प्रकाशन में भी ये
तस्वीरें प्रकाशित हो पाती। दो दिन से अखबारों व चैनलों पर
कहीं भी पुलिस लाठीचार्ज का फोटो नहीं है इसे क्या कहा जाए?
यह प्रमाणित करता है कि लाठीचार्ज के वक्त नेता वहां पर नहीं थे।
नेता होते तो फोटो होता हरेक नेता के पास में शक्तिशाली
मोबाइल फोन है और उनमें कैमरे भी। इन मोबाइलों के बिना
बड़े छोटे नेता एक मिनट भी नहीं रह सकते। नेता वहां नहीं थे
और जनता की पिटाई हुई। पहली लाठीचार्ज और गोली के बाद
प्रशासन से वार्ता हुई जिसमें कौन-कौन नेता थे जो नेता दोपहर
में भाषण देने में आगे थे वे कहां चले गए थे?
नेताओं की सूझबूझ रही कि लाठीचार्ज व गोली के शुरू होने से
पहले वे खिसक गए थे जिसे यह भी कह सकते हैं कि उनको अपने-अपने काम याद आ गए थे और वे भाषण देकर चले गए थे।
नेताओं कार्यकर्ताओं की करीब बीस गाडिय़ों को पुलिस ने
लाठियां मार-मार कर क्षतिग्रस्त किया। ये गाडिय़ां काफी दूरी पर
खड़ी थी। गाडिय़ों के ये मालिक टूटी गाडिय़ों को वहां से ले गए।
ये टूटी गाडिय़ां वहां रहनी चाहिए थी कि पुलिस व प्रशासन का रूप
लोग देखते और इनके फोटो दूर के लोग देखते तो एक पक्का सबूत
था। जहां जान की बाजी लगाकर राकेश बिश्रोई जमा था वहां पर
उसकी कीमत के आगे गाडिय़ों की क्या कीमत थी?
प्रशासन ने पत्रकारों के कैमरे छीन लिए या दबाव से पत्रकारों ने
सौंप दिए लेकिन मोबाइल फोन के कैमरों से पुलिस की लाठीचार्ज
का शूट तो किया जा सकता था और वे घिनौने कहे जाने वाले दृश्य
आमजन के सामने आने चाहिए थे। कहीं न कहीं कमजोरी रही। अनेक बार अधिकारियों के साथ समझे जाने वाले दोस्ताना रिश्तों के कारण ये भूलें और गलतियां होती है और बड़े महत्वपूर्ण तथ्य
छूट जाते हैं। एक पुरानी कहावत है कि सरकारी मशीनरी और
पुलिस किसी की भी नहीं होती। चाहे फिर किसी भी श्रेणी का
पत्रकार व फोटो पत्रकार हो। बार-बार इसके उदाहरण
आंदोलनों में मिलते रहे हैं। पत्रकार फोटो पत्रकारों के
पास साल के 365 दिन होते हैं और अधिकारियों के पास इस
प्रकार के आंदोलनों, संघर्षों के चंद दिन। बस। बात इतनी सी है
कि पत्रकारों ने अपने-अपने संबंधों को मानते हुए जिस स्थान पर
स्वयं को स्थापित कर रखा है वहां से दूर हटकर अधिकारियों
को बताएं। चाहे कोई भी अधिकारी हो। पत्रकार देखें कि
अधिकारियों ने जो व्यवहार किया उसकी रिपोर्ट व समाचार
दबे-दबे क्यों छापे गए?
नेताओं कार्यकर्ताओं, ग्रामीणों, किसानों को भी अपनी पीड़ाएं
याद रखनी चाहिए। अधिकारी चाहे जिस विभाग का हो वक्त आने पर जब भी कार्यवाही की जरूरत हो तो उसे सबक सिखलाने में देरी न हो।
ऐटा-सिंगरासर माइनर का यह आंदोलन प्रशासन व पुलिस कार्यवाही से दबाया नहीं जा सकता। इसका लाभ जनता को मिलेगा इसी सोच से सभी दलों को लगना पड़ेगा।

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