Wednesday, March 18, 2015

अच्छे फंसे .जुगाड़ के सर्टिफिकेट से सरपंच


गांव की सरपंची का मजा ही अनोखा होता है और सरपंच कहलाना तथा सरपंची का ताज पहनना हर कोई चाहता है मगर हरेक की किस्मत में यह ताज पहनना लिखा नहीं होता।
 पंजाबी फिल्मों के सरपंचों की तो टोर ही गजब की होती। सालों पहले देखा करते थे। कम राजस्थान के सरपंच भी नहीं होते। राजस्थान में भी सरपंची की गजब की टोर हो गई। हरेक सरपंच बनने को उत्साहित था। यहां तक की पहले विधायक रह गए लोग भी अपने यार दोस्तों से चर्चा करते रहे कि सरपंच का चुनाव लड़ लेने में क्या बुराई है?
राजस्थान सरकार ने सन् 2015 के सरपंच चुनाव में पंगा डाल दिया।
सरकार ने अधिसूचना जारी करवा दी कि सरपंच कमसे कम आठवीं तक पढ़ा लिखा जरूर होना चाहिए।
अचानक हुई इस घोषणा ने अनेक लोगों की नींद हराम करदी।
अब अचानक आठवीं उत्तीर्ण कहां से हो जाएं?
पढ़ाई किसी ने चार के बाद छोड़ दी थी तो कोई पांच के बाद स्कूल नहीं गया।
कई सालों से सरपंची का दावा कर रहे थे लेकिन राजस्थान सरकार ने सब पर पानी फेर दिया।
सारी उम्मीदें मिट्टी में भी मिला दी। अचानक क्या किया जाए?
अपने हिन्दुस्तान में एक खास बात है।
अपने यहां पर बीमार की दवा बताने वाले सैंकड़ों डाक्टर वैद्य हकीम एक मिनट में पैदा हो जाते हैं।
बस आठवीं तक की परीक्षा उत्तीर्ण का सर्टीफिकेट चाहिए।
सोचा जाने लगा।
मित्र दोस्तों ने दिन रात एक किया और भाग दौड़ कर स्थानीय स्कूल वालों से अतापता किया कि कोई जुगाड़ बैठ जाए।
अपने यहां जुगाड़ तो हर बात का हर सामान का हो जाता है सो आठवी उत्तीर्ण का एक सर्टिफिकेट कबाडऩा कोई मुश्किल कैसे होता?
दोस्तों ने एक ही राय दी कि पैसा तैयार रहे।
धोती की गांठ में हजारों की गड्डीे हो।
राजस्थान से बाहर के इलाके तलाशे गए।
अपने तो सात समंदर पार खोज लें और पाताल में खोज लें।
पंजाब,हरियाणा,उत्तर प्रदेश, बिहार प्रदेशों में एक ही नहीं कई स्कूल वाले और उनके बिचौलिए तैयार।
काम बन गया।
मजा आ गया। जुगाड़ से सरपंची का चुनाव लड़ा और जीत भी गए।
हार जाने वालों का और विरोध करने वालों का दिमाग तो सदा से ही घमसाण मचाने में रहा हे।
सो अपनी सरपंची का ताज उनको नहीं सुहाया।
अदालतों में इस्तगासे दायर कर पुलिस में मुकद्दमें करवा दिए।
बस। एक बात का डर हो गया।
अपन खुद सरपंच होते हुए जेल चले भी जाते तो कोई बात नहीं थी।
इस बार सीट ओरत के नाम थी सो यार दोस्तों के दबाव देने से और अपने दिल में भी हिलोरें उठने से अपन ने पत्नी जी को चुनाव लड़ा दिया।
पत्नी जी जुगाड़ के सर्टिफिकेट से सरपंच बन गई।
अब जुगाड़ यार दोस्तों का दबाव। कौन पूछता है? सारी बातें हवा हो गई।
दोस्तों अपने ही पैसों से जेल का प्रबंध कर लिया।

जिन लोगों ने जुगाड़ का सटिफिकेट लाकर दिया वे किनारा कर गए।
वे लोग यार दोस्त परिचित इस तरह के जुगाड़ में जुट गए ताकि पुलिस उन तक न पहुंचे।
सभी चाहते हैं कि पुलिस सरपंच जी तक ही रहे।
ऐसा हो भी रहा है। पुलिस नहीं पूछ रही कि सरपंच बना व्यक्ति अपने जीवन में गांव के आसपास से दूर नहीं गया तो वह दूसरे प्रदेशों से कैसे ले आया आठवीं का सर्टिफिकेट?
बिचौलियों ने अच्छे खासे पैसे बटोरे और अब सरपंच जी अकेले फंसे हैं और जमानत तक नहीं हो रही।
बिचौलियों ने जरूर इतना जुगाड़ कर लिया है कि पुलिस कोई ऐसा बयान ही जांच में रिकार्ड न करे जिसमें किसी बिचौलिए द्वारा सर्टिफिकेट लाकर देने,सहयोग देने आदि का उल्लेख हो।
सरपंची तो यार दोस्त रिश्तेदार सांझा घोटते लेकिन अब जेल जाने में सरपंचजी के साथ कोई साझेदार नहीं।
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