Saturday, December 13, 2014

वसुंधरा राज का हल्ला। भाजपा के प्रजातंत्र में पावर का बंटवारा क्यों नहीं?

वसुंधरा है ना? जिला नगर संगठनों की जरूरत नहीं है? कौन बोले?

टिप्पणी- करणीदानसिंह राजपूत

राजस्थान में भाजपा का एक साल । जयपुर में एक साल का भाजपा का सम्मेलन 13 दिसम्बर को हुआ। असल में इसे भाजपा का 1 साल का सम्मेलन नहीं बल्कि वसुंधरा राजे के 1 साल का सम्मेलन कहा जाना चाहिए। इस सम्मेलन में वसुंधरा का गुणगान।  किसी में सच्च बोलने की हिम्मत नहीं। इस 1 साल में वही हुआ जो वसुंधरा ने चाहा।
वसुंधरा राजे की उपलब्धियों की चर्चा और बढ़ चढ़ कर बखान। सारे राजस्थान में वसुंधरा राज का हल्ला।
वसुंधरा की निगाहों में गुड बुक्स में रह सकें ऐसे ही बयान समस्त राजस्थान में जारी हुए हैं और कई दिनों तक आगे जारी रहेंगे।
इस एक साल में जो पाया होगा उसकी चर्चा बढ़ा चढ़ा।
लेकिन जो कीमती खोया या ठुकरा दिया गया उसकी चर्चा वसुंधरा खुद तो करेगी ही नहीं। दूसरों की इतनी हिम्मत नहीं की वे वसुंधरा के कार्यों और नीति पर अपने विचार रख पाएं। इसका कारण यह है कि वसुंधरा ही नहीं उसके चाटुकार तक नाराजगी प्रगट करने में आगे रहेंगे। जो बोले उस अकेले को घेरे में लेकर राजनैतिक हत्या कर डालो।
वसुंधरा राजे ने प्रजातंत्रीय भाजपा के रूप पर अपना वर्चस्व इस कदर बनाया हुआ है कि प्रदेश में पूर्ण रूप से संगठन तक नहीं बना है।
राजस्थान में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष पद पर कहने भर को अशोक परनामी हैं लेकिन उनको सारा कार्य वसुंधरा से पूछ कर उनकी सहमति लेकर करना पड़ता है।
जिलाध्यक्षों की नियुक्तियां महीनों तक पड़ी रहीं। वसुंधरा राजे की सहमति से उनके नाम घोषित किए गए। जिलाध्यक्षों ने अपनी कार्यकारिणी भेजी तो वह बस्ते में बंद ही पड़ी रही। वसुंधरा के पास समय नहीं। लेकिन सच्च यह है कि पूरे प्रदेश में यह घोषणा हो रही हे दबदबा कायम किया जा रहा है या हो रहा है कि वसुंधरा की सहमति के बिना एक पता भी नहीं खड़क सकता।
जब जिले की कार्यकारिणी ही घोषित नहीं की जाए तब नगर और देहात मंडलों के बारे में तो सोचना ही बेकार है।
कभी किसी चुनाव का बहाना तो कभी किसी चुनाव का बहाना चलाया जाता रहा है।
समस्त तिजोरियों की चाबियां वसुंधरा राजे अपने पास रखना चाहती हैं।
अब फिर पंचायतों के चुनाव के नाम पर संगठन के पदाधिकारियों की घोषणा को रोक कर रखा जाएगा।
कहने को भाजपा में प्रजातंत्र है लेकिन सच्च में राजशाही है और इसे केन्द्रीय कमान ने स्वीकृति दे रखी है।
वसुंधरा चाहे जिसकी घोषणा करे और चाहे जब पदाधिकारी का गला घोट कर मार दे। ना आरोप सुनाए ना उसका जवाब ले। केवल आदेश ही सुनाए। लेकिन इस तरह की तानाशाही से भीतर ही भीतर नुकसान होते हैं उनका मालूम नहीं पड़ता।
भाजपा के कुचले पीडि़त और अपने को चतुर समझने वाले सभी इस खेल को समझ भी रहें हैं,लेकिन बोल नहीं रहे हैं।
कुछ हिम्मत कर जयपुर पहुंच जाते हैं तो उनको मिलने का समय तत्काल नहीं दिया जाता। जयपुर में एक दिन रहना मुश्किल वहां वसुंधरा राजे को मिलने के लिए चार पांच दिन रूकना पड़े तो? कई बड़े नेताओं तक वसुंधरा राजे को मिलने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
प्रजातंत्र में भाजपा में सारा कुछ केन्द्रीयकरण क्यों? पावर का बंटवारा क्यों नहीं?

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