Tuesday, September 16, 2014

सबसे गरम राजनैतिक मुद्दा:कासनिया ने सूरतगढ़ से वोट क्यों कटवाया?


हनुमानगढ़ जिला प्रमुख पद की राजनीति की चर्चा:
वे कौन लोग हैं जिन्होंने यह सलाह दी थी या कासनिया का खुद का फैसला था?
एक बार वोट कटवाने जुड़वाने के बाद 6 माह से पहले वापस कटवाना जुड़वाना संभव नहीं होता

 - ब्लास्ट की आवाज 15 सितम्बर 2014 की स्पेशल रिपोर्ट -


भाजपा नेता रामप्रताप कासनिया का सूरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र से वोट कटवाना गरमागरम मुद्दा बना हुआ है। कासनिया ने सूरतगढ़ से वोट कटवाने और पीलीबंगा के पंचायत क्षेत्र में जुड़वाने का फैसला क्यों लिया? इसका सही सही जवाब तो खुद कासनिया ही दे सकते हैं। राजनैतिक लोग इस प्रकार के फैसले लेते हैं तो बहुत सोच समझ कर और अपने राजनैतिक लाभ और उज्ज्वल राजनैतिक भविष्य का सोच कर लेते हैं। ऐसे फैसले कार्यकर्ताओं के किसी लाभ की सोच को लेकर नहीं किए जाते। कासनिया को इस फैसले से लाभ होगा या नहीं होगा? यह वक्त बताएगा लेकिन खुद कासनिया ने तो यह फैसला सोच समझ कर लाभ के लिए ही लिया होगा।
यह अलग बात है कि इस फैसले के सार्वजनिक होने में कुछ समय लगा। ब्लास्ट की आवाज ने इस समाचार को खास समझा और कासनिया से ही कन्फर्म करके विशेष रिपोर्ट के रूप में छापा। उस समाचार रिपोर्ट से सूरतगढ़ शहर व आम लोगों तथा भाजपा के कार्यकर्ताओं को मालूम पड़ा। 


उससे पहले किसी को बताया ही नहीं जाए तो मालूम कैसे पड़़़ेï़?
कासनिया खुद ने किसी अखबार वाले को यह समाचार बताया नहीं था।
उनसे वोट कटवाने और पीलीबंगा क्षेत्र में जुड़वाने का पूछा गया और यह भी पूछा गया कि मालूम पड़ा है कि हनुमानगढ़ जिले में जिला प्रमुख पद प्राप्त करने के लिए ऐसा किया गया है?
कासनिया ने वोट कटवाने की हां भरी। कहा वोट सूरतगढ़ से कटवा लेने के बात सही है। वोट लोक सभा चुनाव से पहले कटवा लिया था। उन्होंने तो यह भी बतलाया कि वोट वहां डाल कर भी आए। जिला प्रमुख पद चुनाव बाबत कहा कि उनको कौन बनाएगा जिला प्रमुख? वहां तो पहले से ही लोग तैयारी कर बैठे हुए हैं।
नगरपालिका क्षेत्र का मतदाता पंचायत क्षेत्र में चुनाव नहीं लड़ सकता। कासनिया ने अपना वोट श्रीगंगगानगर जिले के सूरतगढ़ नगरपालिका  से कटवा कर हनुमानगढ़ जिले के पीलीबंगा के ग्राम पंचायत में जुड़वाया है तो उसका सीधा सीधा इशारा पंचायत चुनाव लडऩा ही होता है। इसके लिए 6 माह चाहिए इसलिए यह प्रबंध किया गया। कासनिया पंचायत चुनाव वहां लड़ेंगे या नहीं? यह अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि वे वहां से अपना वोट नहीं कटवाऐंगे।
कासनिया की राजनैतिक यात्रा या प्रभाव इस तरह से समझा जा सकता है। पहले श्रीगंगानगर जिला एक ही था जिसमें हनुमानगढ़ इलाका भी था। सूरतगढ़ तहसील में दो मंडिया पड़ती थी जिसमें सूरतगढ़ और पीलीबंगा थी। कासनिया का उद्भव राजनीति में पीलीबंगा क्षेत्र में हुआ था। जब हनुमानगढ़ जिला बना तब पीलीबंगा तहसील अलग हुई और हनुमानगढ़ में शामिल हुई।
सबसे पहले विधानसभा पीलीबंगा अलग बनी तब सूरतगढ़ तहसील का काफी हिस्सा पीलीबंगा में था। कुल 38 ग्राम पंचायतों में से 26 ग्राम पंचायतें पीलीबंगा विधानसभा क्षेत्र में थी। उस समय सूरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र में अनूपगढ,घड़साना श्रीबिजयनगर तहसीलें शामिल थीं।
इसके  बाद जब नया परिसीमन हुआ और अनूपगढ़ अलग विधानसभा बनाई गई और पीलीबंगा विधानसभा का नया सीमांकन हुआ तब सूरतगढ़ की ग्राम पंचायतें पीलीबंगा से हटा दी गई। ये ग्राम पंचायतें सूरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र में शामिल हो गई। रामप्रताप कासनिया का ग्रामों में तो प्रभाव था लेकिन सूरतगढ़ शहर में कभी भी प्रभाव नहीं हुआ। सूरतगढ़ ने उनको कभी स्वीकार किया ही नहीं।
सन 2003 के चुनाव में पीलीबंगा विधानसभा से गंगाजल मील भाजपा के प्रत्याशी थे और कासनिया को भाजपा की टिकट नहीं मिली थी। तब कासनिया ने चुनौती देते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ा था और जीत पक्की की। उस समय गंगाजल मील और स्वतंत्र प्रत्याशी खड़े राजेन्द्र भादू को हराया था।
इसके बाद जब 2008 में पीलीबंगा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई। तब ये तीनों सूरतगढ़ में चुनाव लडऩे आ गए।
यहां के 2003 में विधायक बने अशोक नागपाल को भाजपा ने 2008 में टिकट नहीं दी। इस चुनाव में नए समीकरण बने। रामप्रताप कासनिया को भाजपा ने टिकट दी। गंगाजल मील वसुंधरा राजे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए अलग हुए तथा कांग्रेस की टिकट ले आए। राजेन्द्र भादू कांंग्रेस की टिकट मांग रहे थे और नहीं मिली तब निर्दली खड़े हो गए। चुनाव परिणाम ने चौंकाया। गंगाजल मील जीते। दूसरे नम्बर पर राजेन्द्र भादू रहे। रामप्रताप कासनिया तीसरे नम्बर पर पहुंचा दिए गए। कासनिया को सूरतगढ़ शहर ने स्वीकार ही नहीं किया।
इसके बाद कासनिया के राजनैतिक हालात सूरतगढ़ में नहीं उभरे। सूरतगढ़ ने उनको स्वीकार नहीं किया। सूरतगढ़ शहर वासियों में गंगाजल मील के 5 सालों में व्यापक भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे मगर कासनिया ने चुप्पी धारण किए रखी। एक प्रकार से उन्होंने स्वयं को कोठी में बंद कर लिया था। पांच साल का वक्त राजनैतिक स्थिति में सुधार करने को बहुत होता है। लोगों ने प्रयास भी किए कोठी से बाहर निकालने के लेकिन उनकी पार नहीं पड़ी। यही कहा जाता रहा कि किसी की मानता तो है नहीं। अपनी ही करनी है। जो लोग प्रयास करने में लगे वे ही निराश हुए।
भाजपा ने 2013 के विधानसभा चुनाव में टिकट परिवर्तन के संकेत दे दिए और 2008 में दूसरे नम्बर पर रहे राजेन्द्रसिंह भादू को टिकट दे दी।
कासनिया तिलमिलाए बैठकें बुलाई विरोध प्रगट किया। पत्रकार वार्ता में भी अपना विरोध जताया। कासनिया के पास में वोट बैंक नहीं मानते हुए पार्टी ने उन विरोधों बैठकों की कोई वैल्यू ही नहीं समझी। कासनिया के साथ जो शहरी नेता टिकटार्थी लगे हुए थे वे डरपोक साबित हुए और राजेन्द्र का झंडा उठाने में पहल की। 



कासनिया ने भी आखिर अपने डांवाडोल भविष्य को देखा तो राजेन्द्र भादू का समर्थन कर दिया और उनके मंच पर माला पहना दी।
उस मंच पर कासनिया ने सीधे सीधे समर्थन नहीं दिया था। राजेन्द्र ने कासनिया को घर जा कर के बुलाया था। 
उस बुलावे पर कासनिया ने समर्थन दिया कि वे पार्टी के लिए फांसी खा रहे हैं। इसके बाद वे पीलीबंगा चले गए। भाजपा की प्रत्याशी श्रीमती द्रोपती के लिए कार्य किया। सूरतगढ़ विधानसभा में उनका कोई काम ही नहीं रहा। पहले भी सूरतगढ़ शहर ने उनको नहीं स्वीकारा और न उन्होंने कोई ऐसा कार्य ही किया कि जनता उनके पीछे लग जाती।
मील काल में वे चुप रहे। राजेन्द्र भादू के चुनाव में समर्थन के बाद नौ महिने बीत गए। भादू का समर्थन किया था इसलिए भादू के कार्यों पर बोल भी नहीं सकते। तथा इससे आगे भी सूरतगढ़ में रहते कोई संभावना भी नजर नहीं आती।
इससे अच्छा है कि राजनीति में नया पद और नई जमीन तलाशी जाए।
जिला प्रमुख का पद नया होगा और जमीन पीलीबंगा की पुरानी जानी पहचानी है जो कासनिया के लिए सदा उपजाऊ रही है। वैसे भी जिला प्रमुख का पद विधायक से कम नहीं होता।
उसका क्षेत्र विधानसभा से बहुत बड़ा होता है। जिला प्रमुख कितने विधायकों,कितने प्रशासनिक अधिकारियों और जिला कलक्टर जिला पुलिस अधीक्षक तक की मौजूदगी में सभा की अध्यक्षता करता है। जिला प्रमुख के अधिकार बहुत व्यापक होते हैं। 
संभव है कि यह सोच कर ही कासनिया ने सूरतगढ़ शहर में से वोट कटवाने का निर्णय लिया हो।
हमारे पाठकों के लिए
साभार- ब्लास्ट की आवाज 15 सितम्बर 2014 की स्पेशल रिपोर्ट -

 

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