सोमवार, 22 सितंबर 2014

भाजपा सूरतगढ़:दिल और दिमाग दोनों खाली


- करणीदानसिंह राजपूत -

सम्मानीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी के जन्म दिवस पर धन संग्रह कर जम्मू कश्मीर के बाढ़ पीडि़तों को भिजवाने के पूजा जैसे पवित्र कार्य में जरूर जरूर पहुंचने का प्यार भरा आमंत्रण मिलने पर मैं बड़े उत्साह से उसमें शामिल होने को पहुंचा। इस कार्यक्रम का साक्षी बनना भी महत्व रखता था तथा इसकी अच्छी ख्रबर बनाने का उत्साह भी था।
इस पूजा दिवस का प्रसाद भी भाजपा कार्यकर्ताओं की तरफ आदर सत्कार के साथ मिला जो समाचार पत्रों में छप रहा है। ऐसा प्रसाद दिलाने वाले कौन कौन है? यह अभी परदे के पीछे है और सामने कभी तो आ ही जाऐंगे।

पवित्र दिन और पवित्र कार्य के निमंत्रण को कोई भी पत्रकार शायद मना नहीं करता। मालूम हुआ कि मुझ अकेले को ही यह निमंत्रण दिया गया था और इसमें शामिल होने का प्रसाद भी आक्रमण के रूप में मुझ अकेले को ही मिला लेकिन जल्दबाजी में वह बीच में ही बिखर गया। मुझे मिल नहीं पाया।

भाजपा के जिन लोगों ने यह जाल रचा या रचने में भूमिका निभाई उनके न दिल है न दिमाग है। अगर दिल और दिमाग होते तो बुद्धि जरूर होती वे ऐसा दिन और ऐसा स्थान नहीं चुनते। आक्रमण तो कहीं भी करवाया जा सकता था?
एक पवित्र दिन को अपनी ही ना समझी से बदनामी की चर्चा में धकेल दिया।

भाजपा के नेता कहलाने वाले लोग समीक्षा कर देखें कि इससे उन्होंने क्या खोया है और क्या पाया है?
इसमें लगे कि लाभ मिला है तो फिर ऐसी घटनाएं करते रहें।
पत्रकार तो कार्यक्रम अथवा समारोह में दो चार की संख्या में ही पहुंचते हैं और आयोजन कर्ताओं की भीड़ होती है। ऐसा करेंगे तो लाभ में सरकार में पद मिल जाएगा और वहां नहीं मिला तो पार्टी में ऊंचा पद जरूर ही मिल जाएगा।

भाजपा नेताओं के पहले भी प्रेस से कोई संबंध नहीं रहे हैं। सालों का इतिहास खंगाल लें। चाहे किसी चुनाव का समय हो चाहे किसी का मनोनयन हो या धरना प्रदर्शन रहा हो। विधायक बने चाहे मंत्री। प्रेस से कभी भी रू-ब-रू होने की कोशिश नहीं की। ना जाने प्रेस वाले क्या सवाल कर दें? जो भावनाओं से जुड़े होकर पहुृंचते रहे हैं उनके साथ असम्मान होने लगेगा तो वे भी कटेंगे।
किसी पत्रकार से किसी नेता कार्यकर्ता की कोई अप्रसन्नता हो सकती है लेकिन बाकी प्रेस से भी कोई सारोकार नहीं।

कांग्रेस राज में लगभग सभी विभागों में जो कुछ हुआ उस समय पूरे पांच साल प्रेस से भाजपा के कोई संपर्क नहीं रहे। इसके बाद राजस्थान में राज आया तब उसके बाद भी कभी प्रेस कान्फ्रेंस बुलाने तक की कोशिश नहीं की गई। केन्द्र में सरकार बन गई और अब राज्य में नगरपालिका व पंचायतों के चुनाव आ ही चुके हैं। नगरपालिका सूरतगढ़ में भाजपा का बोर्ड बनाने के दावे किए जा रहे हैं,लेकिन प्रेस से संपर्क ऐसे रहे तो दावा खोखला भी साबित हो सकता है। प्रेस के अन्य लोगों के साथ असम्मानजनक सलूक इससे पहले भाजपा नेताओं द्वारा पहले भी किए जा चुके हैं।
उनकी भी समीक्षा करलें।
इसके अलावा ज्यादा जरूरी है कि इस विषय में कांग्रेस से सीख ले लें। यहां कांग्रेस पार्टी व पूर्व में सत्ताधारी गंगाजल मील के विरूद्ध भी खूब छापा गया और अभी भी छपता रहा है लेकिन मीडिया से उनके संपर्क सदा रहे हैं। पत्रकार वार्ता से उन्होंने कभी परहेज नहीं किया और कड़वे से भी कड़वे सवालों के जवाब दिए। उनके समारोह पांच सालों में अनेक बार हुए मगर किसी में असम्मानजनक व्यवहार नहीं हुआ। अच्छा होगा कि प्रेस से अपने व्यवहार में भाजपा नेता सुधार करें।

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

सबसे गरम राजनैतिक मुद्दा:कासनिया ने सूरतगढ़ से वोट क्यों कटवाया?


हनुमानगढ़ जिला प्रमुख पद की राजनीति की चर्चा:
वे कौन लोग हैं जिन्होंने यह सलाह दी थी या कासनिया का खुद का फैसला था?
एक बार वोट कटवाने जुड़वाने के बाद 6 माह से पहले वापस कटवाना जुड़वाना संभव नहीं होता

 - ब्लास्ट की आवाज 15 सितम्बर 2014 की स्पेशल रिपोर्ट -


भाजपा नेता रामप्रताप कासनिया का सूरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र से वोट कटवाना गरमागरम मुद्दा बना हुआ है। कासनिया ने सूरतगढ़ से वोट कटवाने और पीलीबंगा के पंचायत क्षेत्र में जुड़वाने का फैसला क्यों लिया? इसका सही सही जवाब तो खुद कासनिया ही दे सकते हैं। राजनैतिक लोग इस प्रकार के फैसले लेते हैं तो बहुत सोच समझ कर और अपने राजनैतिक लाभ और उज्ज्वल राजनैतिक भविष्य का सोच कर लेते हैं। ऐसे फैसले कार्यकर्ताओं के किसी लाभ की सोच को लेकर नहीं किए जाते। कासनिया को इस फैसले से लाभ होगा या नहीं होगा? यह वक्त बताएगा लेकिन खुद कासनिया ने तो यह फैसला सोच समझ कर लाभ के लिए ही लिया होगा।
यह अलग बात है कि इस फैसले के सार्वजनिक होने में कुछ समय लगा। ब्लास्ट की आवाज ने इस समाचार को खास समझा और कासनिया से ही कन्फर्म करके विशेष रिपोर्ट के रूप में छापा। उस समाचार रिपोर्ट से सूरतगढ़ शहर व आम लोगों तथा भाजपा के कार्यकर्ताओं को मालूम पड़ा। 

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