Sunday, June 18, 2017

आपातकाल बंदियों को स्वतंत्रता सेनानियों जैसी मान्यता व सुविधाएं=पीएम का गौर



विशेष रिपोर्ट- करणीदानसिंह राजपूत

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आपातकाल के बंदियों को स्वतंत्रता सेनानियों के समकक्ष मान्यता व सुविधाएं दी जाने वाले आग्रह पर गौर करवा रहे हैं। 
प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी ने राज्य सभा के सदस्य के.सी.त्यागी के पत्र के उत्तर में इसका उल्लेख किया है कि इस विषय पर गौर करवाया जा रहा है।


( प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के अर्धशासकीय पत्र की तारीख 18 जून 2014 है। 18 जून 2017 को 3 साल पूर्ण हो चुके हैं। इन 3 सालों में क्या विचार, क्या निर्णय हुआ? इसका कुछ मालूम नहीं। प्रधानमंत्री ने यह उत्तर  संसद सदस्य केसी त्यागी को दिया था। जहां तक मेरी सोच है केसी त्यागी की ओर से बाद में कोई पत्रव्यवहार नहीं किया गया। इस प्रकार के न जाने कितने गौर फाइलों में अटके होंगे।मंत्री प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के यहां इस प्रकार के गौर अटक जाएं तो दुख का ही विषय है)

आपातकाल में मीसा में बंदी रहे शिव कुमार मिश्र केन्द्र सरकार से आग्रह किया था कि आपातकाल के बंदियों को स्वतंत्रता सेनानियों के समकक्ष मान्यता देकर सम्मानित कर स्वतंत्रता सेनानियों के बराबर भत्ता अथवा पेंशन दी जाए। 


के.सी.त्यागी ने मिश्र के पत्र का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री के समक्ष यही आग्रह किया कि वे मिश्र के पत्र पर संज्ञान लेकर आपातकाल के बंदियों को उचित सम्मान दिलाने का निर्देश जारी करें। ।

 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसी के उत्तर में लिखा कि इस पर गौर करवाया जा रहा है। सरकारी शैली में इसी प्रकार की भाषा होती है। इसका सीधा सीधा अर्थ यही निकाला जा सकता है कि सरकार गौर कर रही है।


 यह आपातकाल आंतरिक यानि के भीतरी लगाया गया था जिसमें सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों को मीसा,रासुका व शांति भंग कानूनों में गिरफ्तार करके जेलों में ठूंस दिया गया व अनेक प्रकार से मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित भी किया गया। 

आपातकाल की इस कार्यवाही में अनेक परिवार आर्थिक रूप से बरबाद हो गए और 43  सालों बाद भी दयनीय हालत में जी रहे हैं। आज भी अनेक लोगों के पास रहने को खुद के घर नहीं हैं। आजादी के इस संघर्ष में सहयोगी लोगों की उम्र 65-80 वर्ष से अधिक है तथा अनेक शारीरिक रूप से लाचार पीडि़त हो चुके हैं। हजारों लोग संसार से गमन कर चुके हैं तथा हजारों की हालत ऐसी हो रही है।

राजस्थान में भी आपातकाल में हजारों लोग गिरफ्तार किए गए व जेलों में ठूंस दिए गए थे।

26 जून 2017 को इसकी 43 वीं वर्षगांठ अर्थात आपातकाल को लागू किए को 43 वर्ष पूर्ण होंगे।


प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25-26 जून 1975 की मध्यरात्रि से आपातकाल लगवाया। इस अधिसूचना पर राष्ट्रपति फखरूदीन अली अहमद ने हस्ताक्षर किए थे। आपातकाल में संवैधानिक व्यवस्था की कमजोरी उजागर हुई। मौलिक अधिकारों पर पांबंदी लगा दी गई। प्रेस को सेंसर लगा कर खामोश कर दिया गया। यह भी सामने आया कि न्याय पालिका को भी दबाव में कार्य करने को मजबूर किया जा सकता है।
आपातकाल में जयप्रकाश नारायण,मोरारजी देसाई,चौ.चरणसिंह,अटल बिहारी बाजपेयी,लाल कृष्ण आडवानी,जार्ज फर्नान्डीस आदि को जेलों में ठूंस दिया गया था।
अरूण जेतली ने अगले दिन 27 जून को दिल्ली विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथियों के साथ मिल कर आपातकाल के विरोध में सभा की और गायब हो गए।
राजस्थान में भी सूरतगढ़ में 26 जून को गुरूशरण छाबड़ा आदि ने रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार के आगे चौक में आपातकाल के विरोध में सभा की तथा गायब हो गए व बाद में आंदोलन चला कर गिरफ्तारियां दी। राजस्थान में भी अनेक नेताओं व कार्यकर्ताओं को बंदी बना लिया गया था।

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राजस्थान में और मीसा और रासुका बंदियों पेंशन और मेडिकल सुविधा दी जा रही है लेकिन शांति भंग( सीआरपीसी धाराओं) में बंदी बनाए गए लोकतंत्र सेनानियों को पेंशन व अन्य कोई सुविधा नहीं दी जा रही, जिसकी मांग लगातार विभिन्न संगठनों की ओर से की जा रही है।



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स्वतंत्रता सेनानियों जैसी मान्यता में सामान्य सुविधाएं
पेंशन,चिकित्सा,रेल निशुल्क यात्रा व साथ में एक सहयोगी को निशुल्क यात्रा सुविधा।
बस में यात्रा सुविधा। आवास के लिए भूखंड की सुविधा। संतान को भी शिक्षा आदि की सुविधा है।

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26-6-2014.
अपडेट 18-6-2017.
 

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