Saturday, December 7, 2013

स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र मानेवाला का देश की धरती को आखरी सलाम

पाकिस्तान की मिंटगुमरी जेल में दो वर्ष तक बंदी रहे-

 अग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में बंदी रहे थे


 

खास रिपोर्ट- करणीदानसिंह राजपूत

सूरतगढ़, 7 दिसम्बर 2013. स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र मानेवाला का आज शाम को करीब साढ़े पांच बजे राजस्थान की तहसील सूरतगढ़ के ग्राम मानेवाला में स्वर्गवास हो गया। वे करीब डेढ़ माह से बीमार थे।
रामचन्द्र पुत्र गहनाराम का जन्म अविभाजित भारत में 21 जनवरी 1926 में माडी हजारा तहसील पाट पाटन जिला मिंटगुमरी में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। मिडील तक शिक्षित रामचन्द्र ने अग्रेजों के विरूद्ध आयोजित 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था। उनको जेल हुई और मिंटगुमरी जेल में रहना पड़ा। देश के बंटवारे के बाद 18 अगस्त 1947 को परिवार के साथ पाकिस्तान छोड़ा व पैदल ही रवाना होकर हिन्दुस्तान में पहुंचे थे। रामचन्द्र ने बताया कि अगर रेलगाड़ी में आते तो मारे जाते क्योंकि रेलगाड़ी पर मुस्लिम आतताईयों ने हमला कर बुरी तरह से मारकाट की थी। हिन्दुस्तान में पहला पड़ाव फाजिल्का में हुआ तथा 4 साल तक खुडिया ग्राम में रहे।
    रामचन्द्र के परिवार को क्लेम में कुछ भी नहीं मिला था। मानेवाला ग्राम में जो जमीन मिली वह भूमिहीन के रूप में मिली थी, जिसका पहला आवंटन आदेश 1956 में मिला था। स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन उनको मिल रही थी।
    रामचन्द्र ने यहां पर भी भूमि पानी आंदोलनों में भाग लिया। सोशलिस्ट स्व.प्रो. केेदारनाथ, स्व.गुरदयालसिंह संधू,स्व. योगेन्द्रनाथ हांडा और स्व. श्योपतसिंह मक्कासर के साथ में इन आंदोलनों में भाग लिया था। सन 1969 के श्रीगंगानगर जिले के भूमि आंदोलन में इतने लोग गिरफ्तार किए गए थे कि राजस्थान की सारी जेलें भर गई थीं तब रामचन्द्र भी जेल में रहे। स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र मानेवाला कम्बो सिख हैं तथा सूरतगढ़ में जब भी आते हैं तब प्राय: इस पत्रकार से मिलते रहते थे। रामचन्द्र इस समय 87 वर्ष की आयु पार कर चुके थे। काया कृश हो जाने के बाद कमजोरी में भी सूरतगढ़ विभिन्न कार्यों से आते रहते थे।
9 अगस्त 2009  को महामहिम प्रतिभा पाटिल ने स्वतंत्रता सेनानियों को भोज दिया था तब वे भी उसमें शामिल हुए थे।
सूरतगढ़ तहसील में तीन स्वतंत्रता सेनानी थे जिनमें रामचन्द्र अंतिम भी देश की धरती को आखरी सलाम कर चले।
स्व.गुलजारीलाल नंदा उनके मामा लगते थे। नंदा रामच्रन्द्र की माता के ममेरे भाई थे।
कुछ महीनों पहले इस लेखक से मिले तब भी काफी कमजोर दिखाई पड़ रहे थे।
उस समय भी बीती बातों को पूछा तब विभाजन के बारे में बताया था। यह बताया था कि मेनका गांधी के पिता की दादी को भी साथ लेकर आए थे।
उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ 8 दिसम्बर को उनके ग्राम मानेवाला में किया जाएगा। 

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