Tuesday, February 28, 2017

मैं कींगै सागै खेलूं होळी,न कोई भायला अर न कोई भायली-कविता:करणीदानसिंह राजपूत:



मैं कींगै सागै खेलूं होळी,

मैं कींगै लगाऊं गुलाल अर कींगै लगाऊं रंग,

न कोई भायला अर न कोई भायली,

मैं कींगै सागै खेलूं होळी,

ब भायला,लंगोटिया यार,

बण गया नेता

पहरै झक सफेद कुरता पायजामा

बिंयानै बुरो लागै लाल पीळौ गुलाबी रंग

खोटा खोटा कारनामा रा काळा काळा

बढ़ता दाग धब्बा

बिंयानै कुण दिखावै,

लोगां नै कांई दोष,

बै बिचारा आपरा काम निकाळै,

जिका कहावता बात अर कलम रा धणी

बै बण गया डावड़ा जीवणा चाटुकार

सागै पीवै सागै खावै,

अर सागै करै खोटा खोटा काम

बै दारूडिय़ा दागी,

कीयां कलम कैमरा चलावै।

पैली भायलियां नै भी भिजो देता

लगा देता रंग अर गुलाल,

अब टॉप जींस बिंयारी भूंडी हो जावै

म्हारे रंग गुलाल सूं

अब बै क्लब मांय रंगीज इतरावै

अब नेता जी रा लाडला सपूत

बिंयारै रंग लगावै

बिंयारा हाथ कठै कठै लागै,

कुण रोकै कुण टोकै, क्यूं रोकै क्यूं टोकै

ब तो मुसकावै अर बिछ बिछ जावै

साची साची तो आ है

बै भायला अर भायलियां

जिका नेतावां रे सागै रळ मिल ग्या,

बै म्हारै सागै क्यूं खेलै होळी,

मैं कींगै सागै खेलूं होळी

मैं कींगै लगाऊं गुलाल अर कींगै लगाऊं रंग

न कोई भायला अर न कोई भायली

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27- 3- 2013.
up date 28-2-2017.


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