Monday, March 6, 2017

होली:समधनजी की चोली:सग्गे परसंगियों और मित्रों से हंसी मजाक ठिठोली: करणीदानसिंह राजपूत-

ऊंट के मेंगनों पर चासनी चढ़ाई हुई।
 चोली का एक तरफ का फीता गायब और उस तरफ बंधी थी मूंज।

होली अजब गजब त्यौंहार। बसंत पंचमी के दिन से ही चंग ढप पर गीत धमाल और मेहरी नाच,रंग और गुलाल से तन बदन सरोबार। हंसी मजाक और ठिठोली। सग्गे परसंगियों से समधी परिवार से हास परिहास का ऐसा ऐसा रंग की हंसते हंसते पेट में दर्द होने लग जाए। कोई बुरा मानता नहीं और माने तो मानता रहे। हंसी ठिठोली करने वाले तो एक ही वाक्य बोल देते हैं...बुना माना होली है।
होली का त्यौंहार जो आजकल एक दो दिन में सिमट कर रह गया है मगर दिलदार रंग रसिया लोगों व युवाओं के लिए आज भी उतना ही रंगीन है जितना वर्षों पहले होता था।
सग्गे परसंगियों से हंसी ठिठोली के ना जाने कितने तरीके और हर साल कोई ना कोई नया तरीका। उपहार की खोथली यानि कि थैली भेजने का तरीका सबसे ज्यादा हंसाने वाला।

    एक किस्सा यह भी जिसका साक्षी मैं स्वयं रहा हूं। आज भी सुनाता हूं तो सुनने वाले खूब मजे लेते हैं।
पड़ोसी के यहां पर चपड़ी से सील बंद थैला आया। पूरे मोहल्ले में चर्चा हो गई। अड़ोस पड़ोस के लोग सुनते ही उनके घर पहुंच गए। इतना बड़ा थैला। वह भी सील बंद। चपड़ी की सील। होली पर कीमती मिठाईयां आई होंगी। सभी यही अनुमान लगा रहे थे।
आखिर एक तेज चाकू से चपड़ी उखाड़ी गई। पड़ोसी बड़े ध्यान से थैले की सिलाई खोलने लगा। लोग तो चाहते रहे कि थैले को कैंची से काट कर जल्दी से खाल दिया जाए, मगर सिलाई खोलने से हो रही देरी से उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी। थैले के भीतर कई प्रकार के छोटे बड़े कागज के डिब्बे और कितनी ही प्रकार की पुडिय़ां। कई प्रकार के कपड़े। रंग बिरंगी पैकिंग।
    बहुत सुंदर रंगीले डिब्बे  डिब्बे के ढक़न पर लिखा था- सग्गे जी वास्ते खास चासनी लड्डू-बीकानेर के कंदोई बाजार से बनवाए हुए। डिब्बे को जल्दी से खोला गया। उसमें भरे थे छोटे छोटे बड़े सुंदर छोटे छोटे गोल मटोल शानदार चीनी की चासनी चढ़ाए लड्डू। वाह.क्या बात।
एक ने तो बिना पूछे उठाया और मुंह में डाल भी लिया। दो पलों में ही आक थू। सभी ने देखा कि यह क्या हो गया? जल्दी से दूसरा लड्डू तोड़ा गया। सभी की निगाहें आश्चर्य से फटी की फटी रह गई। ऊंट के मेंगनों पर चासनी चढ़ाई हुई।
 सभी हंस पड़े। पड़ोसी भी हंसे बिना नहीं रह सका। आगे भी देखने की उत्सुकता।
एक छोटा डिब्बा खोला गया जो सग्गी जी के लिए था। इसमें भीतर हाथ से लिखी पर्ची थी- सग्गी जी के लिए खास बनवाए नमकीन मंूगी गोटा। मूंगफली गोटों पर बेसन लगा कर तलने के बाद आजकल टेस्टी कहा जाने लगा है। उन दिनों मूंगी गोटा छोटा सा नाम कह दिया जाता था। बाद में किसी ने खाया नहीं। उनको तोड़ कर ही देख लिया गया। बकरी की मेंगनियों को बेसन लगा कर तला हुआ था।
दियासलाई की अनेक प्रकार की रंग बिरंगी बनाई डिब्बियों में रंगी हुई बजरी- मुंह साफ करने के लिए मीठी किरची। एक डिब्बी में रंगी हुई बालुई रेत- हाजमे का चूर्ण।
समधी समधन जी को पान तंबूल। मुंह साफ करने को ये पत्ते क्या थे? कत्था मसाला लगे हुए आक के पत्ते।
    एक बहुत ही अच्छी सुंदर पैकिंग पर लिखा था दिल्ली चावड़ी बाजार से लाई गई सग्गी जी की चोली। सभी एक बार फिर जोरों से खिलखिला पड़े। चोली का एक तरफ का फीता गायब और उस तरफ बंधी थी मूंज।
इस प्रकार की मजाक वाली वस्तुएं एक एक कर निकलती गई।
करणीदानसिंह राजपूत,
राजस्थान सरकार द्वारा अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार,
23,करनाणी धर्मशाला,
सूरतगढ़.
मोबाईल- 94143 81356
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