Saturday, July 2, 2016

जीजा साली पत्नी ने बदले रिश्ते कहानी


पति का पत्नी से,

बहन का बहन से छल:
पत्नी की भी नए रिश्ते की गलती:
जब तीनों की नजरें मिलें.....
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करणीदानसिंह राजपूत   

 
  
टीवी पर आ रहे सीन से बरखा को झटका सा लगा। उसने अपने पास ही बेड पर बैठे जीजा को झिंझोड़ते हुए इशारा किया, कांत...कांत... देखो...देखो । टीवी पर एड चल रहा था... कल रात मुझ से भूल हुई...प्रिकोशन नहीं लिया...  मैं...गर्भवती होना नहीं चाहती... अनवान्टेड पे्रगनेन्सी को रोकने के लिए बहतर घंटे के भीतर अनवान्टेड... ... टिकिया लें।
कांत ने एड खत्म होते ही पैरों में चप्पलें डाली और एक झपट्टे में मोटर साईकिल पर निकल गया। वह पास के मेडिकल स्टोर पर पहुंचा। उसे बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ी। स्टोर के काऊंटर के साथ की दीवार पर अनवान्टेड प्रेगनेन्सी को रोकने की टिकिया का पोस्टर लगा था। उसने पोस्टर की ओर ईशारा कर दिया। फार्मासिस्ट ने एक पैकेट निकाला और कांत के हाथ में पकड़ा दिया।
कांत जिस तेज गति से मेडिकल स्टोर पर गया था, उसी तेज गति
से लौटा। कांत ने पैकेट बरखा के हाथ में रख दिया। बरखा ने  पैक को खोल कर टिकिया को निकाला और कुछ पलों तक देखते रहने के बाद पानी के साथ गटक ली। टिकिया गटकते ही उसे राहत महसूस होने लगी।

 
कांत बोला- अब तुम तीन घंटे रेस्ट करो... तुम्हारी बस तो दोपहर में दो बजे  रवाना होगी। बरखा बेड पर पसर गई। कांत भी पास में ही लेट गया। इसी बेड पर ही बीती रात को वे एकाकार हो गए थे। 


कांत की शादी रमा से हुई थी। यह बेड शादी में उपहार में मिला था। रमा के साथ प्रथम रात्रि यानि की सुहागरात इसी पर मनाई...और उसके बाद इसी पर ही मजे से हर रात बीत रही थी।
कुछ माह पहले रमा बीकानेर से पौने दो सौ किलोमीटर की दूरी पर सूरतगढ़ में एक विद्यालय में अध्यापिका लग गई। कुछ दिनों तक अप डाउन किया, मगर इसमें भारी परेशानी हुई तथा जाने आने में ही छह घंटे तक बीत जाते। इसके अलावा  विभागीय निरीक्षण की सख्ती भी थी। उसने वहीं पर कमरा किराए पर ले लिया।
    रमा शनिवार को ड्यूटी कर शाम तक घर लौट आती। शनिवार शाम से सोमवार की भोर तक का समय व्यस्तता में बीतता। शनिवार शाम को घर लौटते ही रमा और कांत बाजार जाकर खरीदारी करते, खाते पीते और  रात को बेड पर नई प्रेमकथा तैयार करने में जुट जाते। रविवार का आधा दिन घरेलू काम धाम में बीत जाता। उसके बाद दोनों दो तीन घंटे सोकर थकान उतारते। भोजन बनाने खाने के बाद  रविवार की आधी रात तक प्रेमकथा दोहराते।
इसके बाद रमा पुन: ड्यूटी पर जाने की तैयारी में लगती। कांत और रमा करीब तीन बजे बस स्टेंड के लिए घर से मोटर साईकिल पर निकल पड़ते। बस की रवानगी भोर में चार बजे होती तब तक बस के आने का इंतजार करते। बस के इंतजार में खड़े अन्य यात्री रमा को कनखियों से निहारते रहते। कई युवा तो इतने फिटे उदंड होते कि एकदम पास में आकर घूरते हुए निकलते। उनकी आंखों में शरारत झलकती जो कहती कि आओ, मेरी आंखों में होती हुई दिल में समा जाओ।
    कुछ तो पास में आकर कांत से टाइम पूछते, भाई साहब क्या बजा है? बस का राइट टाइम क्या है? कांत को भाई साहब संबोधित कर कुछ पलों के लिए रमा को भाभी बना कर मन ही मन खुश हो जाते। रमा कुछ दिन तक तो लोगों के इस व्यवहार से झुंझलाई मगर बाद में लापरवाह हो गई। कांत बस रवाना होने के बाद घर लौट आता। बस यही सामान्य सी जिंदगी हो गई।
सोमवार से शुक्रवार तक की अवधि में जब रमा नहीं होती तब बरखा आ जाती और एक दो रातें गुजार कर चली जाती। वह बीकानेर से पचास किलो मीटर की दूरी पर नोखा में  एक निजी कंपनी में लिपिक की नौकरी पर लगी हुई थी, जहां से आना जाना आसान था। वह रात को आती और भोर में लौट जाती। फिर भी उसकी झलक आस पास की औरतों ने प्राप्त कर ही ली। यह भी मालूम कर लिया कि बरखा कांत की साली है।
पिछली रात बरखा और कांत ने बेड को तृप्त किया और सुबह देर से उठे। दोनों ने नहा धोकर चाय नाश्ता किया। बरखा टीवी देखने लगी थी, कि ७२ घंटे के भीतर अनचाहे गर्भ को रोकने वाली टिकिया का एड टीवी पर आने लगा। बरखा को एड के सीन से झटका सा लगा। युवती कह रही थी कल रात हम से भूल हुई...मैं अभी गर्भवती नहीं होना चाहती...इसी में अनचाहे गर्भ को रोकने के लिए टिकिया ७२ लेते हुए दिखाया भी गया था।
   बरखा और कांत बड़ी सेफ्टी रखते, मगर बीती रात को गुब्बारा नहीं था। रमा के वस्त्रों के बीच में गुब्बारे रखे होते थे। उन्हीं में से गुब्बारा लेकर फुला लेते थे। रमा ने कभी गिनती नहीं की थी। दोनों ने सोचा एक रात गुब्बारा नहीं उड़ायेंगे, मगर इस निर्णय पर कायम नहीं रह पाए।
         दोनों बेड के दोनों किनारों पर सोए बीच में तकिया भी लगाया। पहले हाथ मिले और बाद में आई बाढ़ ने दोनों किनारों को एकाकार कर दिया। दोनों बाढ़ में बह चले। हां, कांत की नजर बेड के सिरहाने रखी मंढी हुई तस्वीर पर पड़ी। विवाह के तुरंत बाद की तस्वीर जिसमें वह और रमा थे। कांत को लगा कि रमा की आंखें उसे और बरखा को घूर रही है। उसने तस्वीर को पलट कर रख दिया था। उसके बाद बेड का कोई भी दृश्य तस्वीर वाली रमा ने नहीं देखा। मगर बरखा एड देख कर परेशान हो गई थी। उसे टिकिया निगलने के बाद राहत मिली थी।
कांत बरखा को बस पर चढ़ा कर लौटा तो घर खुला पाया। उसे चिंता हो गई कि रमा आज सप्ताह के बीच में कैसे लौट आई है? वह जल्दी से कमरे में घुसा। रमा बेड पर नींद में मिली। कांत की निगाह बेड के नीचे गई जहां पर ७२ घंटे वाली टिकिया का खाली पैक पड़ा था। बरखा की लापरवाही पर एक बार झुंझलाया। रमा की नजर पड़ जाती तो...। उसने खाली पैक को उठाया और बाहर फेंक आया। अब वह रमा की नजरों के लिए साफ सुथरा बन गया था। वह भी नींद में बेसुध रमा के चिपट कर सो गया।
                         दोनों जागे तब कांत ने प्रश्रों की झड़ी सी लगा दी- तुम कब आई? इस वार को तो आती नहीं थी?  कोई बात हो गई क्या? रमा बोली-आज बच्चों का मूड पढऩे का नहीं था। मैं भी वहां रूकने के बजाय छुट्टी का मूड बना घर लौट आई। यहां पर गेट पर ताला लगा था। सोचा कि तुम किसी मित्र के यहां चले  गए हो। ताला खोल कर भीतर आई और सोने के पहले कुछ खा लेने का मन किया। रसोई घर में कुछ ताजा बने होने की खूशबू आ रही थी, मगर मिला कुछ भी नहीं। मैंने चाय बनाई और पीकर सो गई। चाय का नाम लेते ही पुन: चाय की याद आ गई। रमा बोली शाम हो गई है। मैं चाय बना कर लाती हूं। दोनों ने चाय पी और कामों जुट गए।
           शाम को कांत बालकनी में खड़ा इधर उधर देख रहा था। उसकी निगाह पड़ोस के घर के सामने पड़ी। पड़ोसन शर्मा जी की पत्नी और रमा एक दूजे से बतिया रही थी। कांत को लगा कि शर्मा की पत्नी साली के आने जाने के बारे में ही भिड़ा रही होगी।
        कांत शिकायत के बचाव में  मन ही मन बहाना सोचने लगा। साली की चाहत ने पल भर में पत्नी से छल करने का मानस बना दिया। पत्नी घर में घुसी तब तक उसने मन ही मन में एक छल तैयार कर लिया। दो दिन बाद ही साली का जन्म दिन आने वाला था। साली के जन्मदिन की याद ने कांत को बहुत बड़ी राहत दी।

    रमा के घर में घुसते ही कांत बोल पड़ा - अरे...मैं तो तुम्हें बताना ही भूल गया। बरखा आई थी। वह जन्म दिन का निमंत्रण दे गई है। उसे लगा कि रमा यह सुन कर भी संतुष्ट नहीं हुई है तथा उसके दिल में शक समाया है। कांत को करंट सा लगा जब रमा ने पूछा- पिछले हफ्ते भी आई थी क्या? कांत को इस प्रश्र की आशा नहीं थी। कांत ने बड़ी होशियारी से जवाब दिया- बरखा आई जरूर थी, मगर तुम्हारे मौजूद नहीं होने पर वह रूकी नहीं। पानी पीया और खड़े पैरों लौट गई। इसका क्या बताता।
       कांत ने कहा-तुम्हें किसने बताया? लगता है पड़ोसी एक एक मिनट की खोज खबर रखते हैं। रमा बोली- मुझे तो साथ के घर वाली शर्मा जी की पत्नी ने बताया। कांत का दिमाग तेजी से काम करने लगा था। उसने पत्नी पर विश्वास जमाने और शर्मा की पत्नी को झूठी साबित करने के लिए तुरूप का इक्का मारते हुए कुछ आक्रोश भरे शब्दों में कहा - वह कलूटी...चुगली खा रही थी... तो वह इतना गिर गई है कि बदला लेने पर तुल गई है।
  कांत के आक्रोश भरे शब्दों ने जादू का सा प्रभाव डाला। रमा बोली-तुम्हारे साथ उसका कोई झगड़ा हुआ क्या? तुमने कभी बताया नहीं। किस बात का बदला

लेगी वह? कांत बोला- उससे कोई झगड़ा नहीं हुआ। मगर मैं उसके व्यवहार के पीछे नहीं जाना चाहता। पड़ोस में रहना है। ऐसे ही कोई बात बढ़ जाएगी और लोग अपने अपने स्वार्थों से मतलब निकालेंगे। कोई उधर होगा तो कोई अपनी ओर होगा। नाहक ही बदनामी होगी। लोग भी मर्द को ही दोष देंगे।
रमा बोली- इसका मतलब तो बात कोई गंभीर है जो तुमने मुझे बतलाई नहीं।
कांत बोला- अरे तुम उसे गोली मारो...साली कुतिया। अरे...जब तुम यहां नहीं होती हो... तब उसके घर में चाय चीनी खत्म हो जाती है। खासकर शर्मा जी नहीं होते... तब वह आती है और सीधे रसोईघर में घुस जाती है...जो मुझे कत्तई पसंद नहीं है। कोई भी स्त्री दूसरी स्त्री को अपनी रसोई में डिब्बे संभालने की छूट नहीं देती। कांत का तीर सही निशाने पर था। रमा प्रभावित हुई और बोली- शर्मा की पत्नी इतनी घटिया होगी, यह तो कभी सोचा भी नहीं था। डोरे डाल रही है और पार नहीं पड़ी तो इस तरह की शिकायत करने पर ही उतर आई।
कांत बोला- छोटी बहन बड़ी बहन के घर पर नहीं आयेगी तो फिर किसके आयेगी? तुम इस प्रकार की घटिया शिकायतों पर सोचना बंद करो। आओ, बरखा के जन्म दिन पर जो उपहार देना है उसके बारे में सोचें।
कांत ने रमा को कमरे में बैठाया और स्वयं बाहर निकल आया। उसने सारे घटनाक्रम को जल्दी से मोबाईल पर बरखा को बताया। उसे बता दिया कि जन्मदिन के निमंत्रण का बहाना मार कर बचाव किया है। इसके साथ में सलाह भी दे दी कि तुरंत ही बहन को जन्मदिन पर आने का निमंत्रण देकर विश्वास जमा दे।
कुछ ही देर में रमा के मोबाईल की घंटी बजी। रमा ने मोबाईल ऑन किया। रमा बोल रही थी- हां बरखा, बोल। अच्छा...अच्छा...जन्मदिन है... तुम्हारे जीजाजी ने बता दिया ...हम उपहार की ही चर्चा कर रहे थे। अरे...तूं यह बता कैसी है? कई दिनों से मिली ही नहीं। आजा। दो चार दिन रह कर चली जाना...दफ्तर वफ्तर छोड़...दो चार दिन की छुट्टियां ही ले ले। कांत का बहाना यानि कि छल पूरा काम कर गया।
रमा और कांत के बीच में बरखा को दिए जाने वाले उपहार के बारे में चर्चा हुई। रमा कोई निर्णय नहीं ले पाई। कांत के मन में साली के रूप में छिपी  पे्रमिका को उपहार देने की चाहत ने निर्णय किया। सोने की अंगूठी दी जाए जो सदा उसकी अंगुली में रहती हुई शरीर को छूती रहेगी।
बरखा के जन्मदिन पर पति पत्नी दोनों लूनकरनसर पहुंच गए। यहां पर रमा और बरखा का पैतृक निवास था। पिता की मृत्यु के बाद उनकी माता शांता और बरखा यहां रहती थी। बरखा नौकरी के कारण नोखा में कमरा किराए पर लेकर रहने लगी थी। वह मां के पास यदा कदा आती रहती थी।
बरखा ने घर में बने मंदिर में देव प्रतिमाओं के आगे देशी घी का दीप प्रज्ज्वलित किया और भोग लगाया। सर्व प्रथम अपनी मां शांता को प्रसाद खिलाया। रमा बोली अजब संजोग है... रसमाधुरी और राजभोग का प्रसाद...। बरखा बोल पड़ी- जीजू को रसमाधुरी पसंद है और मुझे राजभोग... दोनों रस भरे। वह खिलखिला पड़ी। बरखा ने रसमाधुरी उठाई और कांत को खिलाने के लिए उसके मुंह की ओर हाथ बढ़ाया। कांत ने बीच में ही हाथ पकड़ लिया तो वह बोल पड़ी- जीजू ऐसे नहीं...मेरे हाथ से ही खानी पड़ेगी। उसने रसमाधुरी कांत के मुंह में ठूंस दी और तालियां बजाते हुए हंस पड़ी।
      कांत ने भी राजभोग उठाया और बरखा के मुंह में ठूंसने के लिए हाथ आगे बढ़ाया ही था कि रमा बोल पड़ी- इतना बड़ा राजभोग मुंह में कैसे जाएगा? कांत हंसते हुए बोल पड़ा...चला जाएगा। हंसी मजाक के बीच में रमा ने सुनहरी मखमली डिब्बी खोली और उसमें से लकदक करती हुई अंगूठी निकाल कर कांत के हाथ में ही थमा दी-तुम ही पहना दो...तुम्हारी प्यारी साली है...याद करेगी जीजा ने कितनी प्यारी सी गिफ्ट दी है।
 कांत ने अंगूठी बरखा की अंगुली में पहनाई तब उसकी निगाहें बरखा के चेहरे पर टिकी रही। बरखा ने जीजा की तरफ नजरें टिका कर अंगूठी इस तरह से चूमी मानो अंगूठी नहीं जीजा ही हो।
कांत और रमा घर लौटे तो बरखा भी साथ ही आ गई। बरखा दो दिन रही। इस बीच रमा के दिल और दिमाग में पड़ोसन शर्माजी की पत्नी की शिकायत गूंजती रही। कांत और बरखा सावधानी बरतते रहे जिससे कहीं भी यह झलक तक नहीं मिली कि दोनों के बीच में कुछ है। रमा बिना पुष्ट प्रमाण के अपनी बहन और पति को कुछ कहती तो  हंसी का पात्र बनती। वह चुप रही। उसने कहना तो दूर रहा इशारा तक नहीं किया। उसके दिल में शर्माजी की पत्नी की एक ही बात बार बार चोट करती कि तुम्हारी बहन प्राय: आती है और अब तो रात को नहीं दिन में भी आने लगी है।
रमा ने सोचा कि शर्मा की पत्नी को तो कोई लाभ हानि नहीं है। वह झूठी शिकायत क्यों करेगी? इस बार तो शर्माजी की पत्नी ने साफ साफ ही कह दिया- मैं तुम्हारे ही भले की कह रही हूं। समय रहते चेत जाना ठीक है। कहीं बाद में पछताना ना पड़े। रमा को बातें करते हुए काफी समय बीत गया तब शर्मा की पत्नी ने कहा...कहो तो आंवला पानी बनादूं...मीठा नमकीन जैसा तुम चाहो। चाय आदि तो हम पीते नहीं है। आंवला भिगो देते हैं और उसी का पेय बना लेते हैं। बड़ा स्वादिष्ट बनता है। रमा ने मीठा नमकीन तो सुना ही नहीं उसका सिर तो इतना सुन कर ही चकराने लगा कि दोनों चाय पीते ही नहीं है। कांत ने तो कहा था कि शर्मा की पत्नी चाय चीनी लेने आ जाती है और खास कर शर्मा नहीं होते तब चाय चीनी खत्म होती है...वह सीधे रसोईघर में घुस जाती है। इसका मतलब है कि कांत ने इतना बड़ा झूठ बोला। इसके बावजूद रमा को विश्वास नहीं हुआ और पूछ बैठी- क्या,सच में आप लोग चाय नहीं पीते?
शर्मा की पत्नी ने कहा- हम दोनों ही चाय नहीं पीते। रमा का सिर दर्द होने लगा। कांत ने बरखा और अपने संबंधों की शिकायत को झुठलाने के लिए इतना बड़ा झूठ बोला और शर्मा की पत्नी के चरित्र पर कीचड़ मलने में जरा भी संकोच नहीं किया। रमा के सामने से एक बहुत बड़ा परदा हट गया। उसे कांत और बरखा के संबंधों पर घिन आने लगी। वह घर आई और सिर पर रूमाल की पट्टी बांध कर सो गई।
रमा के दिल में यह तो साफ हो गया कि कांत बड़ी सफाई से झूठ बोल कर बच जाता है। उसने बहुत सोचा और निर्णय किया कि किसी दिन अचानक घर पर पहुंच कर देखा जाए।
रमा ने स्कूल में से बरखा के दफ्तर फोन किया। उधर से चपरासी बोला तो रमा ने बरखा से बात कराने का कहा। वहां जवाब मिला कि बरखा तो आज आई  ही नहीं। चपरासी बरखा के दफ्तर न आने का कोई भी कारण नहीं बता सका।
   रमा को पड़ोसन की बात सच सी लगने लगी। उसके मन में आशंका होने लगी कि बरखा कांत के पास ही हो सकती है। रमा ने कांत के मोबाईल पर रिंग दी मगर स्वीच ऑफ मिला। बरखा के मोबाईल पर रिंग दी मगर उसकी ओर से भी कोई उत्तर नहीं आया। उसका शक मजबूत होने लगा। उसके मुंह से अनायास ही निकल पड़ा- कांत ने मोबाईल बंद कर रखा है और बहन उत्तर ही नहीं दे रही। उसके मन में कुछ बाकी नहीं रहा। 
     वह नान स्टॉप बस में सवार हो कर लौटी। टू सीटर टैंपों को फुल किराए पर करके घर तक पहुंची। टू सीटर को घर से कुछ दूर ही रूकवाया ताकि उसके शोर से कांत और बरखा चौकन्ने ना हो जाएं। वह पैदल ही घर पहुंची। मुख्य गेट को धीमे से खोल कर भीतर घुसी और चप्पलों को वहीं उतार दिया। आंगन के दरवाजे को धकेला तो वह बंद मिला। उसने दूसरी चाबी से ताला खोला। शयनकक्ष में झांका। कांत बेड पर निद्रामग्र था।
        उसने वस्त्र बदले और बेड पर जा बैठी। उसका बैठना हुआ कि कांत के मुंह से शब्द निकले - बरखा, नींद नहीं आ रही है क्या? रमा को झटका लगा। वह बोली- मैं बरखा नहीं रमा हूं। नींद में भी पीछा नहीं छोड़ती...प्यारी साली। रमा के शब्दों ने कांत की नींद उड़ादी।
     कांत बड़े विनम्र शब्दों में बोला- तुम तो नाहक शक कर रही हो। उस कलूटी ने शिकायतें कर कर के तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है। जिससे तुम अपनी बहन पर ही शक करने लगी हो। काश तुम्हें बरखा के हाल का पता चला होता। बरखा सुबह से आई हुई है। वह उल्टी दस्त से बुरी तरह से परेशान थी। उससे चला तक नहीं जा रहा था। निजी क्लिनिक में डाक्टर को दिखलाया। दवाईयों के बाद हालत कुछ सुधरी है। वह दूसरे कमरे में सो रही है। मैंने सोचा कि बरखा को नींद नहीं आ रही है और वह बेड पर आ कर बैठी होगी। मेरे मुंह से इसलिए उसका नाम निकल पड़ा और तुम शक कर बैठी।
      कांत का शातिर दिमाग नए नए छल रचने में माहिर हो गया था। उसे मालूम पड़ चुका था कि रमा को दोनों पर पूरा शक हो चुका है तथा मामूली सी भूल या गलती से कभी भी पकड़ में आ जायेंगे।
उसने बरखा के आते ही बीमारी के बहाने का यह छल सोच लिया था। वह बरखा को लेकर निजी क्लिनिक में  पहुंचा और उल्टी दस्त का होना बताया। सभी जानते हैं कि इसमें रोगी के कथन पर ही डाक्टर विश्वास कर लेता है। डाक्टर ने उसके कथन के अनुसार दवाईयां लिख दी और रेस्ट करने का कह दिया। सारी दवाईयां 80 रूपए में आ गई। बरखा का साथ और रमा के दिमाग में बहाना फिट करने के लिए यह कीमत तो कुछ भी नहीं थी।
चाय का बहाना तार तार हो जाने के बाद यही लगा कि कांत फिर कोई बहाना ही रच रहा है। लेकिन बहन की बीमारी का सुन कर  वह संभालने को तत्पर हो उठी।
रमा ने जल्दी से दूसरे कमरे का दरवाजा धकेला। दरवाजा भीतर से बंद था। उसने खिड़की में से झांका। बरखा फर्श पर बिछी दरी पर सो रही थी। उसके पास में ही दवाओं के कुछ खाली रेपर भी पड़े थे। रमा ने दरवाजा बजाया तो बरखा ने खोल दिया। रमा ने पूछा- बरखा, तुम्हारी तबीयत कैसी है?  छल में भागीदार बनी बरखा ने थके शब्दों में कहा- बार बार टायलेट तक जाते जाते थक गई हूं...कुछ ठीक हूं...नींद आ रही है। रमा छल पकड़ नहीं पाई और बोली- तुम बहुत थकी मांदी लग रही हो...सो जाओ।
बरखा और कांत उल्टी दस्त के बहाने पर हंसते हंसते बेड पर एकाकार हुए थे और बाद में बरखा दूसरे कमरे में जाकर लेट गई थी। अचानक पहुंचने के बावजूद भी रमा के हाथ कुछ भी नहीं लगा।
     रमा का व्यवहार कुछ दिनों से लगातार अटपटा पाकर एक दिन प्रिंसिपल  ने कहा- रमा कुछ दिनों से तुम परेशान नजर आ रही हो तथा बच्चों को पढ़ाने में भी तुम्हारा ध्यान नहीं है। कुछ बताओ। संभव है मेरी भागीदारी से तुम्हारी परेशानी का कोई हल निकल जाए...कहते हैं कि परेशानी बांटने से जी हल्का हो जाता है।
सर, मैं उलझन में फंसी हूं... बात ही कुछ ऐसी है कि... वह बीच में ही रूक गई। प्रिंसिपल ने कहा- तुम अभी नहीं बताना चाहती हो तो मत बतलाओ...मेरे घर चलते हैं...वहां अपना जी हल्का कर लेना।  हो सकता है जिस बात को लेकर तुम परेशान हो, वह कुछ भी ना हो...उसका मतलब ही कुछ और निकले।
प्रिंसिपल के घर पर रमा फफक पड़ी। उसने अपने पति और छोटी बहन को लेकर पड़ोसन की कही बातें एक एक कर बतलादी। यह भी बतला दिया कि वह प्रयास करके भी पकड़ नहीं पाई है। लेकिन यह सच है कि उसकी गैर मौजूदगी में दोनों मिलते हैं।
रमा तुम्हारी बहन का तुम्हारी अनुपस्थिति में  बार बार तुम्हारे घर पर जाना और तुम्हारे पति से मिलना शंका तो पैदा करते ही हैं...प्रिंसिपल बोला... पड़ोसन की बातों में कुछ दम तो है...उन्हें अस्वीकार भी नहीं किया जा सकता। प्रिंसिपल के शब्दों से रमा की भावनाओं पर मरहम सा लगा।
रमा प्रिंसिपल के सीने से लग रोने लगी और प्रिंसिपल रमा की पीठ को सहलाते हुए दिलासा देने लगे कि सब कुछ ठीक ठाक हो जाएगा। प्रिंसिपल की भावनाओं में उथल पुथल मच गई। उन्ह लगा कि उनके हाथ रमा की पीठ को नहीं बल्कि एक खूबसूरत युवती के मादक बदन को सहला रहे हैं। रमा भी स्पर्श  के सुखद अहसास में सब कुछ भूल गई। दोनों सहज में ही पैदा हुए झरने के जल प्रवाह में बहने लगे। भीगने के शीतल अहसास से रमा की पलकें मुंदती चली गई।
उसकी आंखें खुली तो स्वयं को प्रिंसिपल की बाहों में पाया। वह उठने लगी मगर उठ नहीं पाई। बोलने की कोशिश की मगर बोल नहीं पाई। उसके दिल में एक आवाज आई कि कि बरखा और कांत भी तो यही कर रहे हैं...यह तो अनुचित हो रहा है, मगर यह आवाज शक्ति हीन सी रही और रमा की आंखें पुन: मुंदती चली गई।
     सारी रात वह मदहोशी में रही। सुबह आंख खुली तब होश आया। वह और प्रिंसिपल एक ही बेड पर थे। वह उनसे चिपटी हुई थी। रमा ने उनका हाथ अपने बदन से हटाया और अपने वस्त्रों को संवारा। वह प्रिंसिपल को सोता हुआ छोड़ कर जल्दी से बाहर निकल पड़ी।
वह अपने किराए के कमरे पर पहुंची और स्नानघर में समा गई। काफी देर तक अपने बदन को रगड़ रगड़ कर नहाती रही। प्रिंसिपल के छूने का जहां जहां अहसास हुआ। वहां वहां बार बार साबुन लगाती रही...रगड़ती रही। मन ने कहा - कहां कहां पर रगड़ती रहेगी...क्या सारे बदन को ही रगडऩा नहीं पड़ेगा? उसके हाथ रूक गए।
वह नहा धोकर तैयार हुई और उसके पांव एक बार फिर प्रिंसिपल के घर की ओर ही बढ़ चले। न जाने कौनसा आकर्षण उसी ओर खींचता ले जा रहा था। वह उनके शयन कक्ष में ही चली गई।
वे टीवी पर कोई नृत्य गीत देखने में मग्र थे। उन्होंने रमा की तरफ देखा। उसकी आंखों में एक प्रश्र तैरता हुआ नजर आया ...एक पीडि़ता को सांत्वना देने के नाम पर तुम्हारा चरित्र भी तार तार हो गया।
 प्रिंसिपल को लगा कि रमा कुछ देर और सामने रही तो सुन्न होते चले जाऐंगे। उन्होंने कहा- रमा, कल मैं बहक गया था...मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था... मैं  दोषी हूं...तुम जो चाहे भला बुरा कह सकती हो...पत्नि की मौत के बाद वर्षों तक एकाकी जीवन में रह गया...मगर कल न जाने मैं कैसे पागल बन गया। मैं अब यहां से चला जाऊंगा।
रमा बोल पड़ी- नहीं सर, मैं बहक गई थी। मैं दोषी हूं। काश मैं आपके घर नहीं आती। मैं चली जाऊंगी अपने घर...मुझे क्षमा कर देना...। आपके आचरण और विद्यालय के अनुशासन का लोग उदाहरण देते हैं...वे कायम रहें। रमा 
प्रिंसिपल के सीने से लग कर रो पड़ी। वे भी सुबक पड़े।
इसके बाद दोनों विद्यालय पहुंचे। रमा ने त्यागपत्र लिखा।
प्रिंसिपल ने तुरंत ही स्वीकृति दी। रमा ने किराए का कमरा खाली किया और बस से घर के लिए रवाना हो गई।
रमा घर के आगे टैंपो से उतरी ही थी कि ठीक उसी समय बरखा ने एक पैकेट बाहर फेंका। रमा ने बरखा को पैकेट फेंकते हुए और बरखा ने रमा को टैंपो से उतरते हुए देख लिया। बरखा गेट से बाहर निकलते हुए बोल पड़ी- दीदी...। यह आवाज सुन कर कांत भी बाहर निकल आया।
रमा ने फेंका हुआ पैकेट उठा लिया था। अनवान्टेड... टिकिया का खाली पैक था।
बरखा कांत व रमा की छह आंखें मिली मगर कुछ सूझने के बजाय अंधेरा छाया
था।

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महिला आयोग व अनेक संस्थाओं व सामाजिक विचारकों का मानना है कि महिलाओं के साथ दुराचार,देह शोषण,अनैतिक यौनाचार फुसला कर किया जाता है और यह भी माना जा रहा है कि रिश्तों में महिलाओं व लड़कियों के साथ अनैतिक कार्य ज्यादा होते हैं।
ऐसी स्थिति में महिलाओं व लड़कियों को सावधानी जरूरी है। उन्हें सदा सतर्क रहना चाहिए ताकि उनके साथ किसी प्रकार की घटना न हो सके। अपने परिवार वालों पर भी नजर रखनी जरूरी है। यही तानाबाना इस  कहानी का है। 

 - करणीदानसिंह राजपूत,
स्वतंत्र पत्रकार,
सूरतगढ़, राजस्थान।
94143 81356

up date - 21-10-2015 

up date - 1-1-2016
up date    2-7-2016 

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