Wednesday, July 26, 2017

किसानों को वर्षों पहले दी जमीनों का आवंटन रद्द करने का तानाशाही आदेश हुआ था

किसानों को वर्षों पहले दी जमीनों का आवंटन रद्द करने का  आदेश हुआ था
सूरतगढ़ में भी 3 सौ से अधिक किसानों की टीसी खारिज करदी गई थी

भू राजस्व तहसीलदार हर्षवर्धनसिंह राठौड़ का पत्र जो जिला कलकटर को लिखा गया था में उल्लेख किया गया है कि भ्रमण के दौरान उनकी जानकारी में आया कि टीसी जमीनों का गैर कृषि कार्यों में उपयोग किया जा रहा है सो जमीनें निरस्त कर दी गई और अतिक्रमण ना हो इसके लिए पालिका को सौंप दी गई।

किसानों को वर्षों पहले दी जमीनों का आवंटन रद्द करने का तानाशाही आदेश हुआ था 

सूरतगढ़ में भी 3 सौ से अधिक किसानों की टीसी खारिज करदी गई थी

किसानों से छीनी गई मगर नगरीय विकास के बजाय सारी जमीन पर माफिया काबिज हो गए

राजस्व और नगरपालिका अधिकारियों का भू माफिया को संरक्षण

करणीदानसिंह राजपूत

सूरतगढ़, 17 जून 2011.

अपडेट.   26 जुलाई 2017.




शहरों के विकास के लिए चिपती हुई राजस्व भूमि नागरपालिका आदि को सौंपने के लिए राजस्थान सरकार ने एक आदेश जारी किया था, जिसकी भाषा से वह आदेश तानाशाही आदेश लगता है, जिसके तहत किसानों वर्षों पहले आवंटित टीसी जमीनें खरिज कर दी गई और किसान संगठित नहीं होने के कारण उस आदेश के विरूद्ध कुछ भी नहीं कर पाए तथा रोजी रोटी से वंचित हो गए। इस आदेश से ही सूरतगढ़ के नगरपालिका से चिपते हुए क्षेत्र के किसानों को टीसी पर आवंटित बारानी भूमि का आवंटन निरस्त कर दिया गया। 3 सौ से अधिक किसान एक दो माह की कार्यवाही में अपनी रोजी रोटी से वंचित कर दिए गए। किसान संगठित और अधिक पढ़े लिखे ना होने के वजह से इस आदेश की साफ साफ लिखी खारिज करने की इबारत को समझ नहीं पाए। किस तरह की जमीन को खारिज किया जाना था तथा पालिका को सौंपा जाना चाहिए था।
    यह आदेश राजस्थान सरकार के राजस्व ग्रुप -6 की ओर से दिनांक 8 फरवरी 2006 को जारी किया गया था। इसमें साफ साफ ही लिखा था कि आवंटन निरस्त करना ही है तथा पट्टे की अवधि को बढ़ाना नहीं है। इस आदेश की फोटो प्रति यहां पर प्रकाशित की जा रही है ताकि पढ़ कर जाना जा सके कि किस तरह से तानाशाही की गई।
    इस आदेश से तो यही लगता है कि किसानों की रोजी रोटी की चिंता तक नहीं की गई। शहरी विकास के नाम पर यह लागू किया गया।  तीस चालीस सालों से जो किसान इस जमीन की सार संभाल कर रहे थे तथा खातेदारी मिलने का इंतजार कर रहे थे, उनको मालूम नहीं था कि उनकी वृद्धावस्था में यह तानाशाही वाला आदेश लागू किया जाएगा। अगर वे लोग किसी और कार्य में लगे होते तो वह संपति छीनी तो नहीं जाती।
    सरकार यह कह सकती है कि जमीन केवल एक वर्ष के लिए ही आवंटित की गई थी तब हर साल बाद उसका नवीनीकरण क्यों किया जाता रहा? सरकार का एक बहाना यह भी रहा है कि खेती नहीं कर रहे थे, इसलिए जमीनें निरस्त कर दी गई। सभी जानते हैं कि बारानी भूमि में वर्षा होने पर ही खेती होती है और पांच सात साल बाद जा कर खेती के लायक वर्षा होती है तो किसान खेती करता ही है, लेकिन वषा्र नहीं होने पर पेट पालने के लिए उसको अन्य रोजगार करने को मजबूर होना ही पड़ता है। अपने ही खेत में या उसमें बनी ढ़ाणी में किसान ने कोई कारखाना अथवा फेकटरी तो लगाई नहीं थी कोई छोटा काम जरूयर किया होगा जो किसी न किसी रूप में किसान व खेती से जुड़ा हुआ ही होगा।
    जो भी रहा हो, 3 सौ से अधिक किसानों की जमीनें निरस्त की गई जिसका मतलब यह निकलता है कि एक के साथ 5 का परिवार माने तो 1500 सौ से ज्यादा लोगों की रोटी छीनी गई।
    सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस विकास के लिए जमीनें ली गई वह तो एक ईंच में भी नहीं हो पाया। प्रभावशाली राजनीतिज्ञों के चहेते भू माफिया ने सारी जमीनों पर अतिक्रमण कर लिया। भू माफिया जमीनें आगे से आगे बेचते रहे माला माल होते रहे। भू माफिया का अतिक्रमण एक एक दो दो बीघों में अभी भी हैं, मगर किसी भी राजस्व अधिकारी यानि की एडीएम, एसडीएम, तहसीलदार की तथा नगरपालिका के अधिशाषी अधिकारी की हिम्मत नहीं हो रही है कि एक सिरे से लग कर दूजे सिरे तक अतिक्रमण हटवा दें। अधिकारी अतिक्रमण स्थल पर जाते हैं तथा वहां पर किसी गरीब की झुग्गी या कच्चा कोठा जेसीबी से हटवा कर अखबारों में छपवा कर रिकार्ड में अपना नाम दर्ज करते हैं। वे अतिक्रमण कारियों की कोठियों को ध्वस्त करने की हिम्मत नहीं करते?   
    एक तहसीलदार भू राजस्व हर्षवर्धनसिंह राठौड़ का पत्र जो जिला कलकटर को लिखा गया था में उल्लेख किया गया है कि भ्रमण के दौरान उनकी जानकारी में आया कि टीसी जमीनों का गैर कृषि कार्यों में उपयोग किया जा रहा है सो जमीनें निरस्त कर दी गई और अतिक्रमण ना हो इसके लिए पालिका को सौंप दी गई। सवाल यह है कि अभी तक जमीनें किसके अधिकार क्षेत्र में है यह भी साफ नहीं हो रहा है। कृषि के लिए आवंटित जमीनें अगर उस समय दुरूपयोग की जा रही थी तो अब अतिक्रमण से उनका कौनसा सदुपयोग होता हुआ प्रशासन देख रहा है।
    जब ये जमीनें किसानों के पास में थी तब इन पर कब्जे नहीं थे। पालिका को कागजों में जमीनें सौंपी गई थी उसका ब्यौरा है जिसमें अतिक्रमणों का ब्यौरा भी है। मिलान करके देखा जा सकता है कि इन कागजातों के तैयार किए जाने के बाद में कितने कब्जे हुए और कितने क्षेत्र पर हुए। तानाशाही वाला आदेश संभव है किसानों को उस समय  मिला नहीं  हो। यह आदेश यहां प्रकाशित किया गया है, जिसकी प्रतिलिपि सरकार से अधिकृत रूप में प्राप्त भी की जा सकती है।
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